गाजियाबाद, 25 मार्च (विवरण): भारत में पहली बार परोक्ष इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के तहत गाजियाबाद के हरीश राणा को 13 साल के दर्दनाक दौर से मुक्ति मिल गई है। ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) में विशेषज्ञों की देखरेख में उन्होंने अंतिम सांस ली। यह फैसला न केवल हरीश के लिए, बल्कि भारत में इच्छामृत्यु के कानून पर भी एक महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।
13 साल पहले एक दुखद दुर्घटना ने हरीश राणा को कोमा में डाल दिया था। उनके माता-पिता और भाई ने उनके इलाज के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। देशभर में विशेषज्ञों की राय ली गई, हर संभव इलाज कराया गया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। हरीश का जीवन कोमा के अंधेरे में ही सिमट कर रह गया था।
अंततः, उनके परिवार ने उनके लिए गौरवपूर्ण मृत्यु की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय दिया और हरीश को इच्छामृत्यु की अनुमति दी। यह निर्णय भारत में पहली बार किसी व्यक्ति को परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति देता है।
हरीश राणा की मृत्यु के बाद, उनके परिवार के सदस्यों ने उनके क्रियाशील अंगों को दान करने की इच्छा जताई है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है जो अंग प्रत्यारोपण के लिए एक नई उम्मीद ला सकता है। एम्स के सूत्रों के अनुसार, हरीश के अंगों की जांच की जाएगी और कार्यशील पाए जाने पर उन्हें दान किया जा सकता है।
हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु के कानून पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देगा। यह निर्णय न केवल हरीश के लिए, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी एक मार्गदर्शक साबित हो सकता है जो इसी तरह की स्थिति में हैं।
यह ऐतिहासिक निर्णय भारत में इच्छामृत्यु के कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। यह निर्णय न केवल हरीश के लिए, बल्कि अन्य लोगों के लिए भी एक मार्गदर्शक साबित हो सकता है जो इसी तरह की स्थिति में हैं।









