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देहरादून: रातोंरात बदला स्कूल का ‘नाम और निशान’, सुबह पहुंचे बच्चे तो टीचर भी मिले नए; गेट पर भड़के अभिभावक, जमकर काटा बवाल

On: April 24, 2026 6:32 AM
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देहरादून में रक्षा अनुसंधान विद्यालय का नाम बदलने पर स्कूल गेट के बाहर प्रदर्शन करते अभिभावक और पुलिस बल।

​देहरादून (उत्तराखंड):

शिक्षा के मंदिर में अक्सर अनुशासन और नियोजन की बातें होती हैं, लेकिन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक ऐसा ‘अजब-गजब’ मामला सामने आया है जिसने शिक्षा जगत को हैरान कर दिया है। देहरादून के सुंदरवाला स्थित रक्षा अनुसंधान विद्यालय (RAV) में रातोंरात हुए एक बड़े बदलाव ने सैकड़ों छात्रों और अभिभावकों के भविष्य पर असमंजस के बादल मंडरा दिए हैं। जब गुरुवार सुबह अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने पहुंचे, तो वहां का नजारा देख उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं—स्कूल का नाम बदल चुका था, पुराने बोर्ड गायब थे और गेट पर तैनात शिक्षक भी पूरी तरह नए थे।

​क्या है पूरा विवाद?

​मामला रायपुर रोड स्थित सुंदरवाला के रक्षा अनुसंधान विद्यालय (आरएवी) का है। जानकारी के अनुसार, इस स्कूल का प्रबंधन अचानक डीआरडीओ (DRDO) से हटाकर डीएवी (DAV) पब्लिक स्कूल को सौंप दिया गया है। यह पूरी प्रक्रिया इतनी गुपचुप और तेजी से हुई कि न तो वहां वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों को इसकी भनक लगी और न ही अपने बच्चों का भविष्य संवार रहे अभिभावकों को।

​गुरुवार सुबह जैसे ही बच्चे स्कूल पहुंचे, गेट पर रक्षा अनुसंधान विद्यालय की जगह ‘डीएवी’ का नया फ्लेक्स लगा मिला। इतना ही नहीं, स्कूल के भीतर पुरानी फैकल्टी की जगह नए प्रधानाचार्य और शिक्षकों की टीम तैनात थी। इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसे बदलाव ने अभिभावकों के सब्र का बांध तोड़ दिया।

​मैदान में तब्दील हुआ स्कूल परिसर, फाड़े गए फ्लेक्स

​अचानक हुए इस बदलाव से गुस्साए अभिभावकों और छात्रों ने स्कूल गेट पर ही मोर्चा खोल दिया। देखते ही देखते शांतिपूर्ण विरोध ने उग्र प्रदर्शन का रूप ले लिया। आक्रोशित भीड़ ने स्कूल के गेट पर लगे नए प्रबंधन के फ्लेक्स फाड़ डाले और जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना था कि वे नई प्रधानाचार्य और नए शिक्षकों को स्कूल के भीतर दाखिल नहीं होने देंगे। मौके पर मौजूद छात्रों के चेहरों पर भी डर और गुस्से के भाव साफ नजर आ रहे थे।

​अभिभावकों की चिंता: किताबें, यूनिफॉर्म और भारी फीस

​अभिभावकों का आरोप है कि नया सत्र शुरू हुए अभी कुछ ही दिन हुए हैं। उन्होंने हजारों रुपये खर्च कर पुरानी व्यवस्था के अनुसार किताबें, कॉपियां और यूनिफॉर्म खरीदी हैं। अब अचानक प्रबंधन बदलने से यह सब ‘रद्दी’ होने की कगार पर है। अभिभावकों की मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:

  • ​अतिरिक्त आर्थिक बोझ: नए प्रबंधन के तहत नई किताबें और यूनिफॉर्म लेने का दबाव।
  • ​फीस स्ट्रक्चर: डीएवी प्रबंधन आने के बाद फीस में संभावित भारी बढ़ोतरी का डर।
  • ​अस्पष्टता: बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के रातोंरात किए गए इस बदलाव ने मैनेजमेंट की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​30 साल से सेवा दे रहे कर्मचारियों का भविष्य अधर में

​यह विवाद केवल बच्चों और अभिभावकों तक सीमित नहीं है। विद्यालय में पिछले 25 से 30 वर्षों से कार्यरत स्टाफ के पैरों तले भी जमीन खिसक गई है। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी नोटिस के सेवा से बाहर करने की तैयारी की जा रही है।

​वर्तमान प्रधानाचार्य विनय भटनागर के अनुसार, डीआरडीओ ने संचालन की जिम्मेदारी डीएवी को दी है और अब पुराने स्टाफ को डीएवी की शर्तों और कम वेतन पर काम करना होगा। वर्षों से केंद्रीय स्तर की सुविधाएं और वेतन पा रहे कर्मचारी अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

​वार्ता रही बेनतीजा, बच्चों को स्कूल न भेजने का एलान

​मामले की गंभीरता को देखते हुए नेशनल एसोसिएशन फॉर पैरेंट्स एंड स्टूडेंट्स राइट्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरिफ खान के नेतृत्व में डीआरडीओ प्रबंधन, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच त्रिपक्षीय वार्ता हुई।

अभिभावकों ने मांग रखी कि:

  • ​अगले तीन वर्षों तक कॉपी-किताब और यूनिफॉर्म में कोई बदलाव न हो।
  • ​पुराने स्टाफ को ही बरकरार रखा जाए।
  • ​फीस में कोई बढ़ोतरी न की जाए।

​हालांकि, प्रबंधन की ओर से इन मांगों पर कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई, जिसके बाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। गुस्से में आए अभिभावकों ने एलान किया है कि जब तक स्थिति स्पष्ट नहीं होती और उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेंगे।

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​प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग

​1993 से संचालित इस विद्यालय में वर्तमान में लगभग 150 छात्र पढ़ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने बच्चों की पढ़ाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। प्रदर्शनकारियों ने अब शिक्षा विभाग और राज्य सरकार से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। अभिभावकों का कहना है कि अगर जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला, तो यह आंदोलन सड़कों पर उतरेगा।
​देहरादून का यह मामला अब एक नजीर बन गया है कि किस तरह प्रबंधन के मनमाने फैसले बच्चों के भविष्य और अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ सकते हैं।

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