देहरादून:
उत्तराखंड में इन दिनों तेल संकट और ईंधन की किल्लत के बीच सीएनजी (CNG) उपभोक्ताओं की जेब पर भारी डाका पड़ रहा है। राज्य में सीएनजी की आसमान छूती कीमतें अब देश की राजधानी दिल्ली और पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश (UP) से भी काफी अधिक हो चुकी हैं। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि पूरे उत्तराखंड में सीएनजी की कीमतें एक समान नहीं हैं। अलग-अलग शहरों में गैस कंपनियों ने अपने मनमुताबिक रेट तय किए हुए हैं, जिसके कारण प्रदेश का आम उपभोक्ता खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। एक तरफ जहां मांग और खपत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कीमतों की इस विसंगति ने जनता और वाहन चालकों की कमर तोड़ दी है।
ईंधन की किल्लत के बीच गैस कंपनियों की मनमानी
चारधाम यात्रा और पर्यटन सीजन के चरम पर होने के कारण राज्य में ईंधन की मांग तेजी से बढ़ी है। लेकिन इस तेल संकट के बीच गैस आपूर्ति करने वाली कंपनियां अपनी मनमर्जी पर उतारू हैं। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में वर्तमान में एक लाख से अधिक सीएनजी पंजीकृत वाहन दौड़ रहे हैं। इन वाहनों को ईंधन देने के लिए प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न निजी व सरकारी गैस कंपनियां काम कर रही हैं। अकेले देहरादून जिले में ‘गेल गैस लिमिटेड’ (GAIL Gas Limited) कुल 16 पंपों के माध्यम से उपभोक्ताओं को सीएनजी मुहैया करा रही है।
पूरे देश में लगभग 44 कंपनियां पीएनजी और सीएनजी की आपूर्ति के क्षेत्र में सक्रिय हैं, लेकिन उत्तराखंड में इन कंपनियों के बीच रेट को लेकर कोई तालमेल नजर नहीं आता। कंपनियों ने अपनी लागत और प्रबंधन का हवाला देकर मनमाने दाम वसूले हैं, जिससे हर शहर के नागरिकों को अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ रही है।
शहर दर शहर कीमतों का गणित: हरिद्वार-कुमाऊं में सबसे बुरा हाल
अगर उत्तराखंड के भीतर सीएनजी की दरों पर नजर डालें, तो आंकड़े चौंकाने वाले हैं। राजधानी देहरादून की तुलना में धर्मनगरी हरिद्वार में सीएनजी 5.50 रुपये प्रति किलोग्राम तक महंगी बिक रही है। वहीं कुमाऊं क्षेत्र के हालात और भी ज्यादा खराब हैं।
विभिन्न शहरों में सीएनजी के मौजूदा दाम:
- देहरादून: ₹94.50 प्रति किलोग्राम
- रुड़की: ₹99.00 प्रति किलोग्राम
- हरिद्वार: ₹100.00 प्रति किलोग्राम
- हल्द्वानी: ₹100.00 प्रति किलोग्राम
- रुद्रपुर: ₹100.00 प्रति किलोग्राम
एक ही राज्य और चंद किलोमीटर की दूरी पर कीमतों में इतना बड़ा अंतर साफ तौर पर गैस कंपनियों की नीतिगत मनमानी को दर्शाता है। इस भारी अंतर का सीधा असर लोकल ट्रांसपोर्टेशन, स्कूल बसों और मालभाड़े पर पड़ रहा है, जिससे आम जरूरत की चीजें भी महंगी होने की आशंका बढ़ गई है।
दिल्ली और यूपी की तुलना में 20% तक महंगी
उत्तराखंड की तुलना में अगर हम पड़ोसी राज्यों और दिल्ली एनसीआर (Delhi-NCR) की बात करें, तो वहां सीएनजी के दाम बेहद राहतकारी हैं। उत्तराखंड में सीएनजी पड़ोसी राज्यों के मुकाबले 10 से 20 फीसदी तक महंगी बेची जा रही है।
- दिल्ली में कीमत: ₹80.09 प्रति किलोग्राम
- नोएडा और गाजियाबाद (यूपी) में कीमत: ₹80.70 प्रति किलोग्राम
- उत्तराखंड में कीमत: ₹94.50 से ₹100.00 प्रति किलोग्राम
प्रतिशत के लिहाज से देखें तो दिल्ली के मुकाबले उत्तराखंड के लोगों को करीब 20 प्रतिशत अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। यही कारण है कि देश के सबसे महंगे सीएनजी दरों वाले राज्यों की सूची में अब उत्तराखंड भी शुमार हो चुका है।
वैट (VAT) कम होने के बावजूद क्यों नहीं मिल रही राहत?
आमतौर पर किसी भी राज्य में ईंधन की कीमतें वहां लगने वाले टैक्स या वैट (Value Added Tax) पर निर्भर करती हैं। इस मामले में उत्तराखंड सरकार की ओर से सीएनजी पर बेहद कम टैक्स लिया जा रहा है। उत्तराखंड में सीएनजी पर मात्र 5 फीसदी वैट लागू है। इसके विपरीत, पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में सीएनजी पर 12 फीसदी वैट वसूला जाता है।
तर्क के हिसाब से जहां टैक्स कम है, वहां गैस सस्ती होनी चाहिए थी। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। यूपी में 12% वैट होने के बावजूद वहां सीएनजी ₹80.70 में मिल रही है, जबकि उत्तराखंड में महज 5% वैट होने के बाद भी कंपनियां ₹100 तक वसूल रही हैं। टैक्स कम होने के बाद भी उपभोक्ताओं को इसका कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है, जो सीधा कंपनियों के मुनाफे और लचर मॉनिटरिंग की ओर इशारा करता है। (नोट: दिल्ली में सीएनजी पर कोई वैट लागू नहीं है)।
पर्यटन और चारधाम यात्रा के बीच खपत 51 हजार किलो के पार
महंगाई के इस तगड़े झटके के बीच राहत की बात सिर्फ इतनी है कि सीएनजी की उपलब्धता बनी हुई है, जिसके चलते इसकी खपत में जबरदस्त उछाल आया है। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल के शुरुआती दिनों तक देहरादून में सीएनजी की दैनिक खपत लगभग 32,000 किलोग्राम थी। लेकिन मई आते-आते यह आंकड़ा 51,000 किलोग्राम प्रतिदिन को पार कर चुका है।
इस भारी उछाल के पीछे मुख्य वजह उत्तराखंड में चल रही चारधाम यात्रा और गर्मियों का पर्यटन सीजन है। वीकेंड (शनिवार-रविवार) आते ही दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक नए नेशनल ग्रीन हाईवे के जरिए उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों का रुख कर रहे हैं। बाहरी राज्यों से आने वाले अधिकांश वाहन सीएनजी आधारित हैं, जिसके कारण दून के 16 पंपों पर सुबह से शाम तक रिफिलिंग के लिए वाहनों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
कीमतों में आ रहे इस भारी अंतर और उपभोक्ताओं की नाराजगी पर अधिकारियों का अपना तर्क है। गेल गैस लिमिटेड के जनरल मैनेजर (GM) अंबुज गौतम के अनुसार, सीएनजी सेक्टर में अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न कंपनियां काम कर रही हैं। प्रत्येक कंपनी प्रबंधकीय स्तर पर आने वाली कुल लागत, गैस के परिवहन खर्च (लॉजिस्टिक्स) और अन्य स्थानीय खर्चों को जोड़कर ही अपने अंतिम रेट तय करती है। यही वजह है कि अलग-अलग शहरों में भौगोलिक और प्रबंधकीय कारणों से रेट में भिन्नता देखने को मिल रही है।
बहरहाल, अधिकारियों के तर्क अपनी जगह हैं, लेकिन तेल संकट के इस दौर में पर्यावरण अनुकूल ईंधन (Green Fuel) अपनाने वाले उत्तराखंड के स्थानीय वाहन चालक और उपभोक्ता इस आर्थिक बोझ से पूरी तरह बेहाल हैं। जनता अब सरकार से मांग कर रही है कि पूरे राज्य में ‘एक राज्य, एक रेट’ की नीति लागू की जाए ताकि कंपनियों की इस खुली मनमानी पर लगाम कसी जा सके।








