नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष का सीधा और गहरा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ ‘रुपये’ पर दिखने लगा है। शुक्रवार को विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई और यह अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.40 के अब तक के सबसे निचले रिकॉर्ड स्तर (All-Time Low) पर जा गिरा।
युद्ध की शुरुआत के बाद से रुपये में यह करीब 3.5% की बड़ी गिरावट है। आंकड़ों पर गौर करें तो 31 मार्च 2025 के बाद से भारतीय मुद्रा की वैल्यू में 10% से ज्यादा की कमी आई है, जिसने आयातकों और आम जनता की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
युद्ध की अनिश्चितता और तेल की कीमतें: रुपये के पतन के मुख्य कारण
मुद्रा विशेषज्ञों (Currency Experts) का मानना है कि रुपये की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मध्य-पूर्व (Middle East) में जारी अस्थिरता है। जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध जैसी स्थिति बनती है, निवेशक जोखिम वाली संपत्तियों (जैसे उभरते बाजारों की मुद्राएं) से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश (जैसे डॉलर और सोना) की ओर भागते हैं।
- कच्चे तेल में उबाल: भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल आयात करता है। खाड़ी देशों में तनाव के कारण तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका से कीमतों में उछाल आया है। तेल महंगा होने का सीधा मतलब है कि भारत को डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ गया है।
- बाजार में ‘रिस्क-ऑफ’ सेंटीमेंट: CR Forex Advisors के विश्लेषकों के अनुसार, इस संघर्ष के जल्द खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। बाजार पूरी तरह से सतर्क है और इस अनिश्चितता ने रुपये जैसी उभरती मुद्राओं के सेंटीमेंट को कमजोर कर दिया है।
2013-14 के ‘टेपर टैंट्रम’ की यादें हुईं ताजा
रुपये में मौजूदा उथल-पुथल ने आर्थिक विशेषज्ञों को 2013-14 के उस दौर की याद दिला दी है, जिसे वैश्विक स्तर पर ‘टेपर टैंट्रम’ (Taper Tantrum) के नाम से जाना जाता है। उस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा प्रोत्साहन वापस लेने के संकेतों ने भारतीय मुद्रा को हिलाकर रख दिया था। लेकिन जानकारों का कहना है कि वर्तमान संकट उससे भी अधिक गंभीर हो सकता है क्योंकि यह सीधे तौर पर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और युद्ध से जुड़ा है।
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सोने-चांदी और कमोडिटी मार्केट पर असर
करेंसी मार्केट के साथ-साथ कीमती धातुओं के बाजार में भी हलचल तेज है। हालांकि संकट के समय सोना सुरक्षित निवेश माना जाता है, लेकिन हालिया ‘रिस्क-ऑफ’ सेंटीमेंट के कारण इसमें भी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है।
- सोना: अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना $4,500 प्रति औंस के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया है।
- चांदी: चांदी की कीमतों में भी बड़ी गिरावट आई है और यह $70 प्रति ट्रॉय औंस के स्तर से काफी नीचे ट्रेड कर रही है।
आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर?
डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने का मतलब है कि अब विदेश से आने वाली हर चीज महंगी हो जाएगी:
- महंगी होगी ईएमआई: आयात महंगा होने से देश में महंगाई (Inflation) बढ़ेगी, जिससे आरबीआई (RBI) को ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ सकती हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक्स और फ्यूल: मोबाइल, लैपटॉप और अन्य विदेशी उपकरण महंगे हो सकते हैं। साथ ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी की संभावना बनी रहेगी।
- विदेशी शिक्षा: विदेश में पढ़ रहे भारतीय छात्रों का खर्च अचानक बढ़ जाएगा क्योंकि उन्हें डॉलर के लिए अब ज्यादा रुपये चुकाने होंगे।
निष्कर्ष: आगे क्या?
आने वाले दिनों में रुपये की चाल पूरी तरह से पश्चिम एशिया के हालातों पर निर्भर करेगी। यदि ईरान और इजरायल के बीच तनाव और बढ़ता है, तो रुपया 95 के स्तर को भी छू सकता है। हालांकि, उम्मीद की जा रही है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके रुपये की गिरावट को थामने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।









