देहरादून
उत्तराखंड की राजनीति के एक युग का अंत हो गया है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय सेना के गौरवशाली अधिकारी रहे मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर से पूरे उत्तराखंड सहित देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में शोक की लहर दौड़ गई है। अपने कड़े अनुशासन, बेदाग छवि और विकास के प्रति दूरदर्शी सोच के लिए पहचाने जाने वाले खंडूड़ी जी का जाना राज्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
उत्तराखंड सरकार ने राज्य के इस महान सपूत के सम्मान में प्रदेश में तीन दिन के राजकीय शोक (State Mourning) की घोषणा की है। मुख्यमंत्री कार्यालय और सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से इस संबंध में मंगलवार को ही विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए थे।
21 मई तक रहेगा राजकीय शोक, आधा झुका रहेगा तिरंगा
राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री के निधन पर 19 मई से 21 मई तक पूरे प्रदेश में तीन दिवसीय राजकीय शोक लागू रहेगा। इस शोक अवधि के दौरान राज्य भर के सभी सरकारी भवनों, कार्यालयों और प्रतिष्ठानों पर फहराया जाने वाला राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) आधा झुका रहेगा।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस तीन दिन की अवधि में राज्य सरकार की ओर से किसी भी प्रकार के आधिकारिक या शासकीय मनोरंजन, सांस्कृतिक अथवा जश्न के कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। यह निर्णय उस महान नेता के प्रति राज्य की कृतज्ञता और गहरे सम्मान का प्रतीक है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश और प्रदेश की सेवा में समर्पित कर दिया।
आज बंद रहेंगे सभी सरकारी कार्यालय, पुलिस सम्मान के साथ दी जाएगी अंतिम विदाई
पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का अंतिम संस्कार आज, 20 मई (बुधवार) को पूरे राजकीय और पुलिस सम्मान के साथ किया जाएगा। राज्य प्रशासन ने यह सुनिश्चित किया है कि उनकी अंतिम विदाई उनके कद और उनके द्वारा देश व प्रदेश को दी गई सेवाओं के अनुरूप ही भव्य और सम्मानजनक हो।
इस दुखद अवसर पर जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए और अधिकारी-कर्मचारियों को उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर देने के लिए, प्रदेश सरकार ने 20 मई को राज्य के सभी सरकारी कार्यालयों, विभागों, और उपक्रमों में पूर्ण अवकाश की घोषणा की है। आज अंतिम संस्कार वाले दिन सभी राजकीय कार्य स्थगित रहेंगे।
पहाड़ों की धड़कन समझते थे खंडूड़ी, ‘सड़क’ को मानते थे जीवनरेखा
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का नाम उत्तराखंड के इतिहास में केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि ‘विकास के भगीरथ’ के रूप में दर्ज रहेगा। उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों से गहरा नाता होने के कारण, वह पहाड़ों की पीड़ा, वहां की चुनौतियों और वहां के लोगों की जरूरतों को बहुत करीब से समझते थे।
उनके करीबियों और वरिष्ठ अधिकारियों (जैसे मधुसूदन जी) के संस्मरणों से यह बात हमेशा उभर कर सामने आती रही है कि जब भी राज्य में पर्वतीय क्षेत्रों के विकास या सड़क परियोजनाओं की रूपरेखा तैयार होती थी, तो खंडूड़ी जी उसमें अपनी व्यक्तिगत और विशेष रुचि दिखाते थे। एक पूर्व सैन्य अधिकारी होने के नाते वह भली-भांति जानते थे कि किसी भी दुर्गम क्षेत्र के लिए सड़क का क्या महत्व होता है।
उनका स्पष्ट मानना था कि पहाड़ों में “सड़क का मतलब केवल सुगम यात्रा नहीं है, बल्कि यह वहां के निवासियों के लिए एक ‘जीवनरेखा’ (Lifeline) है।” सड़क ही वह माध्यम है जिससे पहाड़ों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आपातकालीन सेवाएं पहुंच सकती हैं।
सीमांत क्षेत्रों और चारधाम कनेक्टिविटी के रहे प्रणेता
अपने कार्यकाल के दौरान, मेजर जनरल खंडूड़ी ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि उत्तराखंड सामरिक दृष्टि से एक बेहद महत्वपूर्ण राज्य है, जिसकी सीमाएं अंतरराष्ट्रीय देशों से लगती हैं। इसी रणनीतिक सोच और विकास के प्रति अपने समर्पण के कारण, उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों के जाल को बिछाने और चारधाम यात्रा मार्गों की कनेक्टिविटी को मजबूत करने को लेकर हमेशा गंभीरता दिखाई।
आज उत्तराखंड में जो सड़कों का सुदृढ़ नेटवर्क और ऑल-वेदर रोड जैसी परियोजनाओं की नींव दिखाई देती है, उसके पीछे कहीं न कहीं खंडूड़ी जी की वह दूरदर्शी सोच ही थी, जिसने केंद्र और राज्य के बीच एक मजबूत सेतु का काम किया।
अनुशासन और ईमानदारी की मिसाल
सेना की वर्दी उतारकर खादी पहनने के बाद भी मेजर जनरल खंडूड़ी ने कभी अपने सैन्य अनुशासन को नहीं छोड़ा। राजनीति में उनका प्रवेश सुचिता, ईमानदारी और समयबद्धता का पर्याय बन गया था। उनके कार्यकाल में लिए गए कड़े और पारदर्शी फैसलों के लिए उन्हें ‘उत्तराखंड के विकास पुरुष’ के रूप में भी याद किया जाता है।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तो पूरा उत्तराखंड न केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री को, बल्कि अपने एक ऐसे मार्गदर्शक को नम आंखों से विदाई दे रहा है, जिसने हमेशा ‘राज्य प्रथम’ की नीति पर काम किया। उनका अंतिम सफर भले ही आज संपन्न हो रहा हो, लेकिन पहाड़ों में उनके द्वारा बनवाए गए रास्तों पर चलकर आने वाली पीढ़ियां हमेशा उनके योगदान को याद रखेंगी।
एक नज़र में मुख्य बिंदु:
- राजकीय शोक: 19 मई से 21 मई तक तीन दिवसीय।
- ध्वजारोहण: सभी सरकारी इमारतों पर 21 मई तक राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा।
- शासकीय अवकाश: अंतिम संस्कार के दिन (20 मई) सभी सरकारी कार्यालय और विभाग पूर्णतः बंद।
- सम्मान: पुलिस व राजकीय सम्मान के साथ होगा अंतिम संस्कार।
- निषेध: शोक अवधि के दौरान किसी भी सरकारी मनोरंजन या सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन नहीं।






