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जम्मू-कश्मीर में भूकंप के तेज़ झटके: रिक्टर स्केल पर 5.3 रही तीव्रता, घाटी में फिर पैदा हुई दहशत

On: April 18, 2026 7:16 AM
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कश्मीर की सड़कों पर भूकंप के बाद राहत कार्य और क्षतिग्रस्त दीवारें |

​श्रीनगर, 18 अप्रैल 2026: शनिवार की सुबह जम्मू-कश्मीर की खूबसूरत वादियों के लिए एक डरावनी दस्तक लेकर आई। कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में सुबह-सुबह भूकंप के तेज़ झटके महसूस किए गए, जिससे लोगों में अफरा-तफरी मच गई। रिक्टर पैमाने पर इस भूकंप की तीव्रता 5.3 मापी गई है। हालांकि राहत की बात यह रही कि फिलहाल जान-माल के किसी बड़े नुकसान की तत्काल सूचना नहीं मिली है, लेकिन इन झटकों ने एक बार फिर कश्मीर के ऐतिहासिक जख्मों को हरा कर दिया है।

​सुबह 8:24 बजे हिली धरती: अफगानिस्तान था केंद्र

​आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह भूकंप शनिवार सुबह 8:24 बजे आया। राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के आंकड़ों के मुताबिक, भूकंप का केंद्र अफगानिस्तान का बदाखशान प्रांत था।

​तकनीकी विवरण:

  • ​तीव्रता: 5.3 (रिक्टर स्केल)
  • ​गहराई: जमीन से 190 किलोमीटर नीचे
  • ​अवस्थिति: 36.55 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 70.92 डिग्री पूर्वी देशांतर

​चूंकि भूकंप की गहराई काफी अधिक थी, इसलिए झटकों का असर व्यापक क्षेत्र में हुआ, लेकिन इसकी विनाशकारी क्षमता धरातल पर कम रही। झटके महसूस होते ही श्रीनगर, बारामूला और उरी जैसे इलाकों में लोग अपने घरों से बाहर निकल आए।

​कश्मीर का भूगोल: क्यों बार-बार कांपती है घाटी?

​कश्मीर घाटी भौगोलिक रूप से ‘सीस्मिक ज़ोन 5’ (Seismic Zone V) में आती है, जो इसे भूकंप की दृष्टि से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक बनाता है। भारतीय टेक्टोनिक प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट की ओर खिसक रही है, जिससे हिमालयी क्षेत्रों में भारी तनाव पैदा होता है। यह तनाव जब अचानक मुक्त होता है, तो बड़े भूकंप आते हैं।

​ऐतिहासिक रूप से कश्मीर ने कई बार तबाही का मंजर देखा है। विशेषज्ञों का कहना है कि घाटी एक ऐसी ‘टाइम बम’ पर बैठी है, जहाँ छोटे झटके भविष्य में किसी बड़े खतरे की चेतावनी भी हो सकते हैं।

​इतिहास के काले पन्ने: 2005 की वो भयावह यादें

​आज के झटकों ने 21 साल पहले आए उस महाविनाश की याद दिला दी, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। 8 अक्टूबर, 2005 को आए 7.6 तीव्रता के भूकंप ने कश्मीर के दोनों हिस्सों (भारत और पाकिस्तान) में मौत का तांडव मचाया था।

  • ​भारी क्षति: उस आपदा में 80,000 से अधिक लोगों की जान गई थी।
  • ​उरी और मुजफ्फराबाद: पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर का मुजफ्फराबाद शहर पूरी तरह मलबे में तब्दील हो गया था, जबकि भारतीय सीमा पर स्थित उरी शहर को भी भारी नुकसान झेलना पड़ा था।
  • ​विस्थापन: लाखों लोग बेघर हो गए थे और बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमरा गया था।

  • ​सदियों पुराना है भूकंपों का सिलसिला

​कश्मीर में भूकंप का इतिहास केवल 2005 तक सीमित नहीं है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो घाटी ने कई बार अपनी बनावट को बदलते देखा है:

  • ​1555 का महाभूकंप: यह कश्मीर के इतिहास के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में से एक माना जाता है। इसकी तीव्रता लगभग 7.6 थी। इसने न केवल बस्तियों को उजाड़ा, बल्कि वेशा नदी का मार्ग तक बदल दिया था।
  • ​1885 का बारामूला भूकंप: 30 मई 1885 को आए 6.8 तीव्रता के भूकंप ने श्रीनगर और बारामूला में करीब 3,000 लोगों को मौत की नींद सुला दिया था।
  • ​1828 का प्रभाव: पांड्रेथन जैसे प्राचीन मंदिरों के पुरातात्विक विश्लेषण से पता चलता है कि 1828 में भी एक विनाशकारी भूकंप आया था, जिसने तत्कालीन वास्तुशिल्प को भारी नुकसान पहुंचाया था।

​आधुनिक निर्माण शैली पर विशेषज्ञों की चेतावनी

​भूकंप वैज्ञानिकों और स्ट्रक्चरल इंजीनियरों ने मौजूदा निर्माण पद्धतियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि कश्मीर में पारंपरिक ‘धज्जी-देवारी’ (लकड़ी और मिट्टी का मेल) निर्माण की जगह अब तेजी से सीमेंट-कंक्रीट (RCC) की इमारतें ले रही हैं।

​विशेषज्ञों की प्रमुख चिंताएं:

  • ​कंक्रीट की संवेदनशीलता: भारी कंक्रीट की इमारतें भूकंप के झटकों के दौरान लचीलापन नहीं दिखा पातीं और ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं।
  • ​भूकंप-रोधी तकनीक का अभाव: घाटी में बन रही अधिकांश नई इमारतें ‘बिल्डिंग कोड’ का पालन नहीं कर रही हैं।
  • ​पारंपरिक ज्ञान की अनदेखी: विशेषज्ञ लकड़ी और पत्थर के पारंपरिक मिश्रण वाले निर्माण की वकालत कर रहे हैं, जो झटकों को सोखने में सक्षम होते हैं।

​”अगर हम अपनी निर्माण शैली में बदलाव नहीं करते, तो भविष्य में आने वाला कोई भी बड़ा झटका 2005 से भी बड़ी मानवीय त्रासदी का कारण बन सकता है।” – स्थानीय भूकंप विशेषज्ञ

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​प्रशासन और जनता के लिए संदेश

​भूकंप की इस हालिया घटना के बाद आपदा प्रबंधन विभाग ने लोगों से सतर्क रहने की अपील की है। विशेषज्ञों का कहना है कि लोग अपने घरों में ‘ड्रॉप, कवर और होल्ड’ (झुकें, आड़ लें और पकड़े रहें) जैसी सुरक्षा तकनीकों का अभ्यास करें। साथ ही, पुरानी और जर्जर इमारतों के ऑडिट की भी सख्त जरूरत है।

​आज के झटके भले ही जानलेवा न रहे हों, लेकिन यह प्रकृति की ओर से एक कड़ी चेतावनी है कि हमें विकास के साथ-साथ सुरक्षा और भौगोलिक वास्तविकता को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

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