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Uttarakhand Tunnel Workers: पानी रिसने की चेतावनी के बावजूद नहीं हुई कार्रवाई सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

On: August 16, 2026 1:18 AM
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देहरादून/उत्तरकाशी: उत्तराखंड में पहाड़ों के भीतर चल रहे Tunnel Construction Projects एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। टनल में काम करने वाले कुछ कर्मचारियों का दावा है कि उन्होंने निर्माण के दौरान पानी के रिसाव को लेकर समय रहते अधिकारियों और संबंधित जिम्मेदारों को जानकारी दी थी, लेकिन उनकी शिकायत पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में Tunnel Safety और निर्माण कार्यों की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उत्तराखंड जैसे भूकंपीय और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में टनल निर्माण हमेशा चुनौतीपूर्ण माना जाता है। यहां चट्टानों की संरचना, भूमिगत जलधाराएं, बारिश और भू-स्खलन जैसे कारक निर्माण कार्य को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में Tunnel Workers की ओर से किसी भी तरह के पानी के रिसाव या संरचनात्मक बदलाव की सूचना को गंभीरता से लेना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

कर्मचारियों ने पहले ही बताई थी पानी रिसने की समस्या

Uttarakhand Tunnel Workers के मुताबिक, निर्माण कार्य के दौरान कुछ हिस्सों में पानी के रिसाव के संकेत दिखाई दिए थे। कर्मचारियों ने कथित तौर पर इस समस्या को वरिष्ठ स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की। उनका कहना है कि काम के दौरान पानी का रिसाव महज सामान्य स्थिति नहीं माना जा सकता, क्योंकि लगातार बढ़ता पानी चट्टानों और टनल की संरचना पर असर डाल सकता है।

श्रमिकों का आरोप है कि चेतावनी दिए जाने के बावजूद उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिला। यही वजह है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या निर्माण स्थल पर कर्मचारियों की सुरक्षा संबंधी शिकायतों के लिए प्रभावी reporting mechanism मौजूद था और क्या उनकी शिकायतों का समय रहते तकनीकी परीक्षण किया गया।

Uttarakhand Tunnel Workers: Uttarakhand Tunnel Projects में सुरक्षा क्यों है अहम?

उत्तराखंड में कई बड़े infrastructure projects पहाड़ों के भीतर बनाए जा रहे हैं। सड़क, रेलवे और जलविद्युत परियोजनाओं के लिए Tunnel Construction को महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। हालांकि, हिमालय की भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य मैदानी इलाकों से काफी अलग हैं।

टनल के भीतर अचानक पानी आना, चट्टानों का कमजोर होना, गैस या ऑक्सीजन से संबंधित समस्या और जमीन के दबाव में बदलाव श्रमिकों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय Tunnel Safety मानकों में भी पानी के रिसाव को एक महत्वपूर्ण निरीक्षण बिंदु माना जाता है।

ऐसे में Tunnel Workers द्वारा किसी भी असामान्य गतिविधि की सूचना दिए जाने के बाद विशेषज्ञों की टीम से मौके का निरीक्षण कराना और जरूरत पड़ने पर काम रोकना सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा होना चाहिए।

सिलक्यारा हादसे के बाद फिर बढ़ी चिंता

उत्तराखंड में Tunnel Safety को लेकर सबसे बड़ा सवाल नवंबर 2023 में सिलक्यारा-बड़कोट टनल हादसे के बाद सामने आया था। निर्माणाधीन टनल का एक हिस्सा ढहने के बाद 41 मजदूर अंदर फंस गए थे। लंबे और चुनौतीपूर्ण rescue operation के बाद सभी श्रमिकों को सुरक्षित बाहर निकाला गया था। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी NDRF के रिकॉर्ड में भी इस rescue operation और उससे जुड़ी कई गतिविधियों का उल्लेख दर्ज है।

सिलक्यारा हादसे के बाद टनल निर्माण के दौरान safety audit, emergency response system और geological assessment को लेकर चर्चा तेज हुई थी। ऐसे में यदि किसी दूसरे Tunnel Project में श्रमिकों द्वारा पानी के रिसाव जैसी समस्या की जानकारी दिए जाने का दावा किया जा रहा है, तो यह मामला स्वाभाविक रूप से गंभीर हो जाता है।

पानी का रिसाव सिर्फ निर्माण स्थल की समस्या नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ों के भीतर पानी का प्राकृतिक प्रवाह वहां की geological conditions से जुड़ा होता है। टनल खोदते समय भूमिगत जलधाराओं का रास्ता प्रभावित हो सकता है। कई बार पानी का दबाव बढ़ने पर टनल के अंदर seepage या leakage दिखाई दे सकता है।

उत्तराखंड में पहले भी टनल और भूमिगत परियोजनाओं से जुड़े पानी के रिसाव को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता सामने आती रही है। दिसंबर 2023 में सिलक्यारा से करीब 35 किलोमीटर दूर एक inlet tunnel से पानी के रिसाव को लेकर आसपास के ग्रामीणों ने चिंता जताई थी। स्थानीय लोगों ने बताया था कि लंबे समय से जारी leakage बढ़ गया था और इससे कृषि भूमि प्रभावित होने की आशंका थी।

हालांकि, हर पानी के रिसाव को सीधे किसी बड़े हादसे का कारण नहीं माना जा सकता। इसके लिए geological investigation, structural assessment और water-pressure monitoring जैसे वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होते हैं।

जवाब नहीं मिलने के आरोप ने बढ़ाई चिंता

Tunnel Workers का सबसे गंभीर आरोप यह है कि समस्या की जानकारी देने के बावजूद उन्हें पर्याप्त जवाब नहीं मिला। यदि यह दावा जांच में सही पाया जाता है, तो सवाल केवल leakage का नहीं बल्कि workplace safety communication का भी होगा।

किसी भी high-risk construction site पर काम करने वाले कर्मचारियों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी सुरक्षा संबंधी शिकायत दर्ज होगी, उसका assessment किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर corrective action लिया जाएगा। शिकायतों को नजरअंदाज करने की स्थिति में छोटी समस्या भी भविष्य में बड़ी चुनौती बन सकती है।

अब जांच और जवाबदेही की मांग

मामले को लेकर सबसे महत्वपूर्ण जरूरत निष्पक्ष तकनीकी जांच की है। यह पता लगाया जाना जरूरी है कि पानी का रिसाव कब सामने आया, उसकी मात्रा कितनी थी, कर्मचारियों ने किस स्तर पर इसकी सूचना दी और उसके बाद क्या कदम उठाए गए।

साथ ही यह भी जांचना होगा कि निर्माण स्थल पर नियमित geological monitoring, water-pressure measurement, structural inspection और emergency evacuation व्यवस्था किस स्तर पर मौजूद थी।

Tunnel Safety पर सरकार और कंपनियों को देना होगा ध्यान

Uttarakhand Tunnel Projects राज्य के infrastructure development के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विकास के साथ श्रमिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना भी उतना ही जरूरी है। पहाड़ों में किसी भी निर्माण परियोजना की सफलता केवल उसके समय पर पूरा होने से नहीं बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि काम के दौरान श्रमिकों और आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित की गई।

सिलक्यारा हादसे ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि Tunnel Safety में छोटी-सी चूक भी बड़ी मानवीय त्रासदी का रूप ले सकती है। ऐसे में Tunnel Workers की शिकायतों को गंभीरता से सुनना, उनका रिकॉर्ड रखना और हर warning का तकनीकी मूल्यांकन करना बेहद जरूरी है।

फिलहाल पानी के रिसाव को लेकर सामने आए कर्मचारियों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। लेकिन इस मामले ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा कर दिया है अगर Tunnel Workers ने खतरे की सूचना पहले ही दे दी थी, तो उनकी आवाज पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

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