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Surrendered Women Naxalites: बंदूक छोड़ रैंप तक पहुंचीं महिला नक्सली, कोसा सिल्क ने दिखाई नई जिंदगी की तस्वीर

On: August 15, 2026 2:44 PM
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Surrendered women Naxalites from Bastar walk the ramp in traditional Kosa silk outfits

Surrendered Women Naxalites: छत्तीसगढ़ के बस्तर की पहचान लंबे समय तक माओवादी हिंसा और नक्सलवाद के साए से जुड़ी रही है। लेकिन अब इसी क्षेत्र से बदलाव की ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो उम्मीद जगाती है। Surrendered Women Naxalites ने हथियार छोड़ने के बाद आत्मनिर्भरता की राह पकड़ ली है। रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने पहली बार फैशन रैंप पर वॉक किया।

जिन महिलाओं की जिंदगी कभी जंगलों और हथियारों के बीच गुजरती थी, उन्होंने पारंपरिक कोसा सिल्क और हथकरघा से तैयार परिधानों में मंच पर कदम रखा। यह आयोजन सिर्फ फैशन शो तक सीमित नहीं था, बल्कि मुख्यधारा में लौटने वाली महिलाओं के बदलते जीवन और उनके नए आत्मविश्वास की कहानी भी सामने लेकर आया।

रायपुर में पहली बार रैंप पर उतरीं आत्मसमर्पित महिला नक्सली

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस दौरान आत्मसमर्पित महिला नक्सलियों ने पारंपरिक हथकरघा परिधानों को पहनकर रैंप वॉक किया।

कार्यक्रम में इन महिलाओं ने कोसा सिल्क और हैंडलूम से तैयार कपड़ों को प्रदर्शित किया। कभी माओवादी संगठन का हिस्सा रही इन महिलाओं के लिए यह अनुभव बिल्कुल अलग था। जंगलों में हथियार लेकर चलने वाली महिलाओं ने अब मंच पर अपने हुनर और आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया।

Surrendered Women Naxalites की यह प्रस्तुति इस बात का संकेत भी बनी कि आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास केवल सुरक्षा या कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं होना चाहिए। रोजगार, कौशल और सम्मानजनक जीवन से जोड़ना भी पुनर्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कौन हैं पुनेम दवे?

इस बदलाव की कहानी में पुनेम दवे का नाम भी सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह वर्ष 2007 में माओवादी दलम से जुड़ी थीं और बाद में संगठन की बटालियन नंबर-1 में सक्रिय रहीं। संवेदनशील इलाकों में हथियारों के साथ माओवादी गतिविधियों में शामिल रहने के कारण उनकी जिंदगी लंबे समय तक हिंसा और संघर्ष के बीच रही।

जुलाई 2025 में आत्मसमर्पण के बाद पुनेम दवे के जीवन में बड़ा बदलाव आया। हथियार छोड़ने के बाद उन्होंने हथकरघा से जुड़े काम को अपनाया और नई जिंदगी की शुरुआत की।

अब वही पुनेम दवे रायपुर के मंच पर पारंपरिक परिधान पहनकर रैंप वॉक करती नजर आईं। उनके लिए यह सिर्फ एक कार्यक्रम में हिस्सा लेना नहीं था, बल्कि पुराने जीवन से निकलकर नई पहचान बनाने की कोशिश भी थी।

हथियार से हथकरघे तक का सफर

Surrendered Women Naxalites की कहानी का सबसे अहम पहलू यही बदलाव है। जिन हाथों में कभी हथियार हुआ करते थे, उन्हीं हाथों ने अब बुनाई और पारंपरिक कला को अपनाया है।

बस्तर की संस्कृति और हस्तशिल्प की अपनी अलग पहचान है। कोसा सिल्क और हथकरघा यहां की पारंपरिक विरासत का हिस्सा हैं। आत्मसमर्पित महिलाओं को इसी क्षेत्र से जोड़कर उन्हें कौशल और रोजगार के अवसर देने की कोशिश की जा रही है।

इस बदलाव से इन महिलाओं को आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिल सकता है। साथ ही समाज में उनके लिए एक नई पहचान बनाने का रास्ता भी खुलता है।

सात दिन की ट्रेनिंग से बढ़ा आत्मविश्वास

रैंप वॉक के लिए महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण भी दिया गया। मुंबई से आए पेशेवर विशेषज्ञों ने करीब सात दिनों तक उन्हें ग्रूमिंग, रैंप वॉक, पहनावे और मंच पर बातचीत करने की ट्रेनिंग दी।

शुरुआत में कई महिलाएं मंच और कैमरे के सामने सहज नहीं थीं। लेकिन लगातार अभ्यास के बाद उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ा। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें यह सिखाया गया कि मंच पर किस तरह चलना है, किस तरह खुद को प्रस्तुत करना है और दर्शकों के सामने किस तरह बेझिझक अपनी बात रखनी है।

रैंप पर उतरते समय उनके चेहरे पर दिखाई देने वाला आत्मविश्वास इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर बन गया। यह परिवर्तन केवल कपड़ों या प्रस्तुति का नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर नई शुरुआत का भी प्रतीक था।

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सुकमा की 9 महिलाओं ने पेश की नई मिसाल

कार्यक्रम में सुकमा की नौ आत्मसमर्पित महिलाओं ने भी हिस्सा लिया। उनके रैंप वॉक ने बस्तर की उस छवि को बदलने का प्रयास किया, जो लंबे समय से हिंसा और माओवादी गतिविधियों से जुड़ी रही है।

Surrendered Women Naxalites के मंच पर आने से यह संदेश गया कि मुख्यधारा में लौटने के बाद महिलाओं को अवसर दिए जाएं तो वे अपनी जिंदगी को नए तरीके से आगे बढ़ा सकती हैं।

इन महिलाओं के लिए सम्मान, रोजगार और आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाया गया हर कदम उनके पुनर्वास को मजबूत कर सकता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बढ़ाया हौसला

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आत्मसमर्पित महिलाओं से बातचीत की। उन्होंने मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले और साहस की सराहना की और उनके बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं।

राजधानी रायपुर में पहली बार पहुंचे इन महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात भी खास अनुभव रही। सरकार की पुनर्वास नीति और कौशल विकास से जुड़ी पहलों के माध्यम से आत्मसमर्पित लोगों को रोजगार तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

हथकरघा और पारंपरिक हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण और काम उपलब्ध कराना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

बस्तर में बदलाव की नई कहानी

बस्तर की कहानी लंबे समय तक जंगल, संघर्ष और हिंसा के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन रायपुर के इस कार्यक्रम में दिखाई दी तस्वीर ने उसी कहानी का एक अलग पहलू सामने रखा।

यहां बंदूक की जगह हथकरघा था, भय की जगह आत्मविश्वास था और हिंसा के रास्ते की जगह रोजगार तथा सम्मानजनक जीवन की ओर बढ़ते कदम थे।

पुनेम दवे और अन्य Surrendered Women Naxalites की यह यात्रा बताती है कि आत्मसमर्पण के बाद सही अवसर मिलना कितना महत्वपूर्ण है। पुनर्वास की प्रक्रिया तभी सफल मानी जा सकती है, जब लौटने वाले लोगों को समाज में सम्मान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का अवसर मिले।

रैंप पर बढ़ते ये कदम इसलिए खास हैं क्योंकि यह सिर्फ फैशन की तस्वीर नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें कठिन अतीत पीछे छूट रहा है और आत्मनिर्भरता, सम्मान तथा नई उम्मीद के साथ भविष्य की ओर बढ़ने का रास्ता तैयार हो रहा है।

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