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हल्द्वानी के कॉन्वेंट स्कूलों में बढ़ता नशे का खतरा:छात्र डाइल्यूटर-थिनर की चपेट में, छात्राएं नेल पॉलिश व शराब का कर रहीं सेवन

On: January 8, 2026 1:07 PM
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हल्द्वानी के प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूलों से एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। किशोर उम्र के छात्र-छात्राओं में नशे की लत तेजी से बढ़ रही है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि जहां कुछ छात्र डाइल्यूटर, थिनर और वाइटनर जैसे खतरनाक रसायनों का सेवन कर रहे हैं, वहीं छात्राएं नेल पॉलिश सूंघने और यहां तक कि शराब पीने तक की आदत का शिकार हो चुकी हैं।

यह मामले डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय अस्पताल (एसटीएच) के मनोचिकित्सा विभाग तक पहुंच रहे हैं, जहां 12 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों की नियमित काउंसलिंग की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, हर महीने चार से पांच ऐसे किशोर सामने आ रहे हैं जो किसी न किसी नशे की गिरफ्त में हैं।

अभिभावकों की लापरवाही बन रही बड़ी वजह

अस्पताल के मनोविज्ञानी डॉ. युवराज पंत का कहना है कि बच्चों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे अभिभावकों की अनदेखी एक बड़ा कारण है। बच्चों के व्यवहार में बदलाव—जैसे अचानक चिड़चिड़ापन, अकेले रहना, ज्यादा पैसे की मांग करना या पढ़ाई में रुचि कम होना—इन संकेतों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। नतीजतन, बच्चे धीरे-धीरे नशे की ओर बढ़ जाते हैं।

जब नशा आसानी से उपलब्ध नहीं होता, तब कई किशोर घरेलू या बाजार में मिलने वाले रसायनों जैसे थिनर, डाइल्यूटर, वाइटनर और नेल पॉलिश का इस्तेमाल करने लगते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक है।

छात्रा की पानी की बोतल में मिली वोदका, मचा हड़कंप

हल्द्वानी के एक बड़े निजी स्कूल से सामने आया मामला सभी के लिए चौंकाने वाला है। स्कूल में एक छात्रा की पानी की बोतल में वोदका मिलने से हड़कंप मच गया। मामले की पुष्टि होते ही स्कूल प्रबंधन के हाथ-पांव फूल गए। छात्रा के किशोर अवस्था में होने को देखते हुए स्कूल प्रशासन ने तुरंत उसके माता-पिता को सूचना दी।

इसके बाद बच्ची को नशे की लत से बाहर निकालने के लिए काउंसलिंग शुरू कराई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस तरह के मामलों पर ध्यान न दिया गया, तो आने वाले समय में हालात और भी भयावह हो सकते हैं।

सतर्कता और संवाद है सबसे बड़ा समाधान

मनोचिकित्सकों और शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को नशे से दूर रखने के लिए माता-पिता और स्कूल प्रबंधन दोनों को सजग रहना होगा। बच्चों से खुलकर संवाद, उनकी गतिविधियों पर नजर और भावनात्मक सहयोग ही इस गंभीर समस्या से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है।

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