वॉशिंगटन/बेरुत/जेनेवा।
पश्चिम एशिया (Mid-East) में शांति स्थापित करने की वैश्विक कोशिशों को एक बार फिर बहुत बड़ा झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच अभी महज दो दिन पहले जिस ऐतिहासिक शांति समझौते की नींव रखी गई थी, वह धरातल पर उतरने से पहले ही पूरी तरह खतरे में पड़ती नजर आ रही है। एक तरफ जहां इजरायल ने अमेरिकी रुख को दरकिनार करते हुए दक्षिणी लेबनान में रातभर भीषण बमबारी की है, वहीं दूसरी तरफ स्विट्जरलैंड में होने वाली अमेरिका-ईरान की बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक वार्ता को फिलहाल के लिए टाल दिया गया है। इस ताजा घटनाक्रम ने पूरी दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
वर्साय का ‘शांति फॉर्मूला’ शुरू होने से पहले ही बेपटरी
दरअसल, बीते बुधवार को फ्रांस के ऐतिहासिक वर्साय महल में एक अभूतपूर्व कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में अमेरिका और ईरान के बीच एक शुरुआती शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में साल भर से चल रहे भीषण युद्ध को रोकना और क्षेत्र में स्थिरता लाना था।
इस 14-सूत्रीय शुरुआती समझौते के तहत तय हुआ था कि लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत प्रभाव से रोका जाएगा और कम से कम 60 दिनों के लिए ‘सीजफायर’ (युद्धविराम) लागू रहेगा। लेकिन इस समझौते की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि इजरायल के आक्रामक रुख ने इस पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया।
लेबनान पर इजरायल के ताबड़तोड़ हमले; नेतन्याहू की दोटूक
शांति समझौते की घोषणा के तुरंत बाद इजरायली वायुसेना ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ हवाई हमले शुरू कर दिए। रातभर हुई इस भीषण बमबारी में कम से कम 16 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और भारी तबाही हुई है।
वैश्विक दबाव के बावजूद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कदम पीछे खींचने से साफ इनकार कर दिया है। नेतन्याहू का रुख बेहद कड़ा है; उनका कहना है कि जब तक उत्तरी सीमा से हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता और इजरायली नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक इजरायली सेना लेबनान में अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रखेगी। इजरायल के इस रुख ने सीधे तौर पर अमेरिकी मध्यस्थता वाले समझौते को चुनौती दे दी है।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की बैठक रद्द, स्विट्जरलैंड वार्ता अधर में
वर्साय में हुए शुरुआती समझौते को एक स्थायी और मजबूत शांति का रूप देने के लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक रिसॉर्ट में दोनों देशों के बीच एक उच्च स्तरीय तकनीकी बातचीत होनी थी। इस बेहद संवेदनशील बैठक की अगुवाई अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) करने वाले थे, लेकिन ऐन वक्त पर यह महत्वपूर्ण बैठक रद्द हो गई है और जेडी वेंस ने अपना स्विट्जरलैंड दौरा टाल दिया है।
इस बैठक के टलने को लेकर दो अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं:
- व्हाइट हाउस का तर्क: अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय (White House) ने इस वीआईपी दौरे के टलने के पीछे ‘लॉजिस्टिक्स’ यानी व्यवस्था और समन्वय संबंधी दिक्कतों का हवाला दिया है।
- ईरान का रुख: दूसरी ओर, हिजबुल्लाह समर्थक मीडिया नेटवर्क ‘अल-मायादीन’ के दावों के मुताबिक, ईरान ने लेबनान पर इजरायल के लगातार हो रहे हमलों के विरोध में अपने प्रतिनिधिमंडल को स्विट्जरलैंड भेजने से साफ मना कर दिया है। ईरान का मानना है कि जब तक हमलों पर लगाम नहीं लगती, वार्ता का कोई औचित्य नहीं है।
जेडी वेंस की इजरायल को सख्त और अभूतपूर्व चेतावनी
इस पूरे कूटनीतिक तनाव के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजरायल को बहुत सख्त और दोटूक शब्दों में चेतावनी दी है। अमेरिकी प्रशासन की नाराजगी को जाहिर करते हुए वेंस ने कहा कि, “इस समय पूरी दुनिया में केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही एकमात्र ऐसे राष्ट्राध्यक्ष हैं, जो इजरायल देश के प्रति वास्तविक हमदर्दी रखते हैं।”
बदले हुए वैश्विक परिवेश में अमेरिकी उपराष्ट्रपति का यह बयान बेहद अहम माना जा रहा है। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, वेंस का यह तीखा बयान साफ इशारा करता है कि वाशिंगटन अब तेल अवीव (इजरायल) के इस अड़ियल और आक्रामक रुख से बिल्कुल खुश नहीं है। अमेरिका पर इस समय वैश्विक बिरादरी का भारी दबाव है कि वह इजरायल को नियंत्रित करे और युद्ध को तुरंत रोके।
निष्कर्ष: क्या फेल हो जाएगी वैश्विक कूटनीति?
फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला यह शांति समझौता पूरी तरह अधर में लटक गया है। यदि आगामी कुछ घंटों में लेबनान और गाजा के मोर्चे पर युद्धविराम लागू नहीं होता है, तो पूरी दुनिया को बड़ी राहत देने वाली यह ऐतिहासिक कूटनीतिक कोशिश पूरी तरह जमींदोज हो सकती है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू को मनाने में कामयाब होते हैं या फिर पश्चिम एशिया एक बार फिर भीषण और अनियंत्रित क्षेत्रीय युद्ध की आग में झुलसने के लिए मजबूर हो जाएगा।











