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भारत में मिला सोने का महाभंडार: आंध्र प्रदेश के 4 ठिकानों से निकलेगा हजारों करोड़ का गोल्ड, देश में बदलेगा अर्थव्यवस्था का नक्शा

On: June 20, 2026 3:49 AM
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​विशेष संवाददाता, नई दिल्ली

भारत में सोने के प्रति आम जनता और निवेशकों की दीवानगी किसी से छिपी नहीं है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक, भारतीय समाज में सोने को न सिर्फ समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, बल्कि संकट के समय का सबसे भरोसेमंद साथी भी देखा जाता है। हालांकि, इस भारी मांग को पूरा करने के लिए भारत को हर साल अरबों डॉलर खर्च करके विदेशों से सोना आयात करना पड़ता है। लेकिन अब देश को इस मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनाने और घरेलू अर्थव्यवस्था को एक नई उड़ान देने वाली बेहद उत्साहजनक खबर सामने आई है।


​आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में सोने का एक विशाल भंडार मिला है, जो आने वाले समय में देश के भीतर स्वर्ण उत्पादन की पूरी तस्वीर को बदलकर रख देगा। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इस खोज से आंध्र प्रदेश देश का सबसे बड़ा स्वर्ण उत्पादक और सप्लायर राज्य बनकर उभर सकता है, जिससे भारत की विदेशी आयात पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी।

​50 टन सोने की ऐतिहासिक खोज: आंध्र प्रदेश बनेगा नया ‘गोल्ड हब’

​आंध्र प्रदेश के खनन विभाग की ओर से साझा की गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, राज्य के कुरनूल जिले में करीब 50 टन सोने के विशाल भंडार की पुष्टि हुई है। माइंस विभाग के प्रधान सचिव मुकेश कुमार मीणा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस ऐतिहासिक कामयाबी की घोषणा की।


​उन्होंने स्पष्ट किया कि भूवैज्ञानिक सर्वेक्षणों और शुरुआती खोज के बाद यह साफ हो चुका है कि राज्य के पास देश की सोने की किस्मत बदलने की पूरी क्षमता है। अधिकारियों का मानना है कि इस कमर्शियल उत्पादन की शुरुआत होने के बाद अगले कुछ ही वर्षों में आंध्र प्रदेश घरेलू बाजार में सोने की आपूर्ति करने वाला प्रमुख केंद्र बन जाएगा।

​सिर्फ जोन्नागिरी ही नहीं, इन 4 ठिकानों पर भी छिपा है खजाना

​खनन विभाग के मुताबिक, सरकार का ध्यान केवल एक जगह पर केंद्रित नहीं है। जोन्नागिरी के अलावा राज्य में तीन और ऐसे खनिज-समृद्ध क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहाँ सोने के बड़े भंडार मौजूद होने के पुख्ता संकेत मिले हैं। चिन्हित की गई चार प्रमुख साइट्स इस प्रकार हैं:

  • ​जोन्नागिरी (कुरनूल): यह इस पूरी परियोजना का मुख्य केंद्र है, जहाँ अकेले ही 50 टन से अधिक सोना होने का अनुमान है।
  • ​रामागिरी: इस क्षेत्र में भी प्राचीन काल से खनिज संपदा होने के संकेत मिलते रहे हैं, अब इसे नए सिरे से विकसित किया जाएगा।
  • ​जव्वकुला: भूवैज्ञानिकों की टीम इस साइट पर तकनीकी सर्वे और मैपिंग का काम कर रही है।
  • ​चिगुरुकुंटा बिस्नाटम: यह बेल्ट भी सोने की माइनिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

​राज्य सरकार ने इन चारों ठिकानों के व्यापक विकास और आगे की खोज के लिए एक बेहद महत्वाकांक्षी और विस्तृत कार्ययोजना (Action Plan) तैयार की है।

​जोन्नागिरी में माइनिंग का पूरा गणित: मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू करेंगे शुरुआत

​इस मेगा प्रोजेक्ट के धरातल पर उतरने की कहानी लगभग एक दशक पुरानी है। अधिकारियों ने बताया कि कुरनूल के जोन्नागिरी गांव में सोने के खनन के लिए करीब 1,500 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। शुरुआती चरण में तकनीकी और भौगोलिक चुनौतियों के कारण केवल 500 एकड़ क्षेत्र में ही खोज कार्य किया जा सका था, जहाँ लगभग 13 टन सोना मिलने की प्रबल संभावना जताई गई थी।


​अब रणनीति में बदलाव करते हुए बची हुई 1,000 एकड़ जमीन पर भी युद्ध स्तर पर नए सिरे से खोज और खुदाई का काम शुरू किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब इस पूरी बेल्ट में पूर्ण रूप से काम शुरू होगा, तो कुल रिजर्व का आंकड़ा आसानी से 50 टन के पार चला जाएगा। इस पूरी परियोजना को गति देने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इसी महीने के अंत में आधिकारिक रूप से जोन्नागिरी गोल्ड माइनिंग प्रोजेक्ट का उद्घाटन करेंगे।

​बाजार में खजाने की कीमत: 9,000 करोड़ रुपये तक का अनुमान

​भारतीय सर्राफा बाजार के मौजूदा समीकरणों और सोने की कीमतों के लिहाज से देखें तो जोन्नागिरी में मिले इस 50 टन सोने के भंडार की अनुमानित कीमत करीब 7,500 करोड़ रुपये से लेकर 9,000 करोड़ रुपये के बीच आंकी जा रही है।


​चूंकि वैश्विक भू-राजनीतिक हालातों और अंतरराष्ट्रीय बाजार के रुख के कारण सोने के भाव में रोजाना उतार-चढ़ाव होता रहता है, इसलिए इस खजाने की अंतिम वैल्यूएशन में थोड़ा बहुत बदलाव देखने को मिल सकता है। बहरहाल, विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में सोने की उपलब्धता देश की जीडीपी, राजकोषीय घाटे को कम करने और स्थानीय स्तर पर हजारों प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने में गेमचेंजर साबित होगी।

​एक टन मलबे से महज एक ग्राम सोना: बेहद जटिल है माइनिंग की प्रक्रिया

​जमीन के भीतर से सोना निकालना जितना आकर्षक और रोमांचक लगता है, हकीकत में यह प्रक्रिया उतनी ही जटिल, जोखिम भरी और खर्चीली है। मुकेश कुमार मीणा ने इस तकनीकी पहलू पर विशेष जोर दिया कि गोल्ड माइनिंग के लिए भारी-भरकम पूंजी निवेश (Capital Investment) के साथ-साथ उच्च स्तरीय तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया के जरिए निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को इस काम की कमान सौंपने का फैसला किया है।

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​खनन विभाग के सचिव ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी आंकड़ा साझा करते हुए बताया कि हाल के वर्षों में माइनिंग के दौरान प्रति टन मलबे से सोना निकलने की दर (Yield Rate) में भारी गिरावट आई है। आज के समय में आधुनिक मशीनों से एक टन माइनिंग मटेरियल की प्रोसेसिंग करने के बाद केवल 1 ग्राम शुद्ध सोना हाथ आता है, जबकि पहले यह मात्रा प्रति टन 3 ग्राम तक हुआ करती थी।

उन्होंने साफ किया कि यदि यह दर 0.8 ग्राम प्रति टन से कम हो जाए, तो माइनिंग करना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन जाता है। ऐसे में जोन्नागिरी की साइट व्यावसायिक रूप से बेहद फायदेमंद साबित हो रही है।

​भारत की सोने की भूख और केजीएफ (KGF) की यादें

​भारत दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है, जहाँ हर साल लगभग 800 टन सोने की भारी-भरकम खपत होती है। इस भारी मांग के मुकाबले हमारा घरेलू उत्पादन लगभग न के बराबर है। साल 2000 में कर्नाटक की मशहूर कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) के बंद होने के बाद से भारत का घरेलू उत्पादन लगातार निचले स्तर पर बना हुआ है।


​वर्तमान में कर्नाटक की सरकारी हुट्टी गोल्ड माइन्स (Hutti Gold Mines) ही देश की एकमात्र बड़ी और सक्रिय सोने की खदान है, जिससे सालाना महज 1.5 टन सोने का उत्पादन हो पाता है। ऐसे में अपनी बेहिसाब घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत पूरी तरह से विदेशी आयात पर निर्भर है, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बड़े पैमाने पर बाहर जाता है। आंध्र प्रदेश की यह नई खोज इस मोर्चे पर देश को आत्मनिर्भर बनाने और भारत की सोने की भूख को घरेलू स्तर पर शांत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

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