"उत्तराखंड वेस्ट मैनेजमेंट संकट: दून-हरिद्वार में खड़ा हुआ राज्यभर से ज्यादा ऊंचा कचरे का पहाड़, अल्मोड़ा पूरी तरह पिछड़ा" - Doonprimenews
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“उत्तराखंड वेस्ट मैनेजमेंट संकट: दून-हरिद्वार में खड़ा हुआ राज्यभर से ज्यादा ऊंचा कचरे का पहाड़, अल्मोड़ा पूरी तरह पिछड़ा”

On: August 29, 2025 7:38 AM
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राज्य में 16 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कचरा जमा, सिर्फ 27% का निस्तारण

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में कचरे के पहाड़ लगातार ऊंचे होते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि एनजीटी (राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण) और स्वच्छ भारत मिशन तक इस पर चिंता जता चुके हैं। प्रदेश की 50 से अधिक डंपिंग साइटों पर करीब 22.85 लाख मीट्रिक टन लीगेसी वेस्ट (पुराना कचरा) इकट्ठा हो चुका है, जिसमें से अब तक केवल 6.17 लाख मीट्रिक टन यानी 27 प्रतिशत का ही निस्तारण किया जा सका है।

हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"

देहरादून-हरिद्वार सबसे गंभीर स्थिति में

स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ

राज्य की सबसे बड़ी समस्या देहरादून और हरिद्वार में है। यहां रहने वाली जनसंख्या राज्य की कुल आबादी का सिर्फ 11% है, लेकिन यहां से निकलने वाला कचरा राज्य के 81% अनिस्तारित कचरे का हिस्सा है। देहरादून में 7.14 लाख मीट्रिक टन और हरिद्वार में 3.30 लाख मीट्रिक टन से अधिक कचरा अब भी डंपसाइटों पर पड़ा है।

अल्मोड़ा में निस्तारण शुरू ही नहीं

कुमाऊं क्षेत्र के अल्मोड़ा जिले की स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां पुराने कचरे के निस्तारण का कार्य अब तक शुरू तक नहीं हो पाया है। नतीजतन, पूरा कचरा डंपसाइटों पर जमा होकर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।

कुछ जिलों ने दिखाई बेहतर तस्वीर

हालांकि सभी जिलों में हालात खराब नहीं हैं। शहरी विकास विभाग की रिपोर्ट बताती है कि चमोली में 90%, रुद्रप्रयाग में 100%, ऊधम सिंह नगर में 93% और नैनीताल में 61% लीगेसी वेस्ट का सफलतापूर्वक निस्तारण कर लिया गया है।

राज्यभर में अनिस्तारित कचरे का ब्योरा (मीट्रिक टन में)

देहरादून – 7,14,418

हरिद्वार – 3,30,586

टिहरी – 14,308

अल्मोड़ा – 21,636

बागेश्वर – 20,650

चंपावत – 26,608

नैनीताल – 79,500

पिथौरागढ़ – 39,508

कचरे से होने वाले नुकसान

कचरे के पहाड़ सिर्फ जगह नहीं घेर रहे, बल्कि पर्यावरण और सेहत पर भी बुरा असर डाल रहे हैं।

ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन (मीथेन व कार्बन डाइऑक्साइड) से जलवायु संकट बढ़ रहा है।

लीचेट में मौजूद अमोनिया नदियों और झीलों में ऑक्सीजन कम कर रहा है, जिससे जलीय जीव प्रभावित हो रहे हैं।

कचरे से फैलने वाले कीट और कृमि कई संक्रामक बीमारियों का कारण बनते हैं।

शहरों में रहने वाले लोगों को श्वसन संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है।

जंगलों और वन्यजीवों पर भी सीधा असर पड़ रहा है।

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