रुद्रप्रयाग/गौंडार।
उत्तराखंड के प्रसिद्ध पंचकेदारों में से एक, द्वितीय केदार भगवान मध्यमेश्वर धाम के कपाट गुरुवार सुबह पूरे विधि-विधान, पारंपरिक रीति-रिवाजों और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए हैं। कपाट खुलने के शुभ अवसर पर पूरा मध्यमेश्वर धाम और आस-पास की घाटी भोलेनाथ के जयकारों से गुंजायमान हो उठी। देश-विदेश से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं, स्थानीय हक-हकूकधारियों और बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के पदाधिकारियों की मौजूदगी में तय लग्न पर मंदिर के गर्भगृह के द्वार खोले गए।
कपाट खुलने के साथ ही ग्रीष्मकाल के लिए भगवान मध्यमेश्वर की छह महीने की हिमालयी यात्रा और पूजा-अर्चना शुरू हो गई है। कपाट खुलने के इस पावन मौके पर श्रद्धालुओं के चेहरों पर भारी उत्साह देखा गया, जिससे मध्यमेश्वर घाटी के तमाम यात्रा पड़ावों पर एक बार फिर से रौनक लौट आई है।
वैदिक मंत्रोच्चार और तय लग्न पर हुआ कपाट उद्घाटन
बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) के मीडिया प्रभारी डॉ. हरीश गौड़ ने जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व निर्धारित शुभ मुहूर्त के अनुसार गुरुवार पूर्वाह्न (सुबह) ठीक 11:30 बजे भगवान मध्यमेश्वर जी के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलने से पहले मंदिर के मुख्य पुजारी और वेदपाठियों ने गर्भगृह के द्वार पर विशेष पूजा-अर्चना की और वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया। इसके बाद जैसे ही कपाट खोले गए, वैसे ही वहां मौजूद भक्तों ने ‘बम-बम भोले’ और ‘जय बाबा मध्यमेश्वर’ के गगनभेदी जयकारे लगाए।
कपाट खुलने के तुरंत बाद भगवान के स्वयंभू शिवलिंग को निर्वाण रूप से सजाया गया और इस सीजन की पहली मुख्य आरती व भोग प्रक्रिया संपन्न की गई। अब आगामी शीतकाल तक भक्त यहीं पर भगवान शिव के नाभि क्षेत्र के दर्शन और पूजा-अर्चना कर सकेंगे।
लोक वाद्यों और मंगल गीतों के साथ धाम पहुंची उत्सव डोली
इससे पहले, भगवान मध्यमेश्वर की पावन चल विग्रह उत्सव डोली बुधवार को सैकड़ों श्रद्धालुओं के हुजूम, महिलाओं के पारंपरिक मंगल गीतों और स्थानीय लोक वाद्यों (ढोल-दमाऊ, भंकोरे) की मधुर लहरियों के बीच अपने अंतिम पड़ाव गौंडार गांव पहुंची थी, जहां रात्रि प्रवास के दौरान डोली का भव्य स्वागत किया गया था।
गुरुवार तड़के सुबह गौंडार गांव में भगवान की विशेष पूजा की गई और डोली ने धाम के लिए प्रस्थान किया। गौंडार से रवाना होकर उत्सव डोली बनातोली, खटारा, नानौ, मैखम्भा और कूनचट्टी जैसे बेहद खूबसूरत और दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होते हुए मध्यमेश्वर धाम पहुंची। डोली के धाम पहुंचते ही वहां का माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
ओंकारेश्वर मंदिर से शुरू हुई थी धार्मिक यात्रा
भगवान मध्यमेश्वर जी की यह पावन डोली यात्रा 19 मई को उनके शीतकालीन गद्दीस्थल श्री ओंकारेश्वर मंदिर (ऊखीमठ) से अपने प्रथम पड़ाव श्री राकेश्वरी मंदिर (रांसी) के लिए रवाना हुई थी। इसके बाद अगले दिन यानी 20 मई को यह डोली हक-हकूकधारियों के पैतृक गांव गौंडार पहुंची। आज (21 मई को) गौंडार से प्रस्थान कर डोली अपने गंतव्य मध्यमेश्वर धाम पहुंची, जिसके बाद कपाट खोलने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया।
यात्रा पड़ावों पर लौटी रौनक, स्थानीय व्यापारियों में खुशी
चारधाम यात्रा के साथ-साथ पंचकेदारों की यात्रा का उत्तराखंड की आर्थिकी और पर्यटन में बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। मध्यमेश्वर धाम के कपाट खुलने और यात्रियों की बढ़ती आवाजाही से पूरी मध्यमेश्वर घाटी के यात्रा पड़ावों जैसे रांसी, गौंडार, बनातोली और कूनचट्टी में रौनक लौट आई है।
पिछले कई महीनों से शांत पड़े इन पहाड़ी पड़ावों पर अब पर्यटकों और शिवभक्तों की चहल-पहल शुरू हो गई है। स्थानीय होमस्टे संचालकों, दुकानदारों, घोड़े-खच्चर मालिकों और स्थानीय गाइडों के चेहरे खिल उठे हैं। क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियां तेज होने से स्थानीय रोजगार को एक नया संबल मिलने की उम्मीद है।
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पंचकेदारों में द्वितीय केदार का विशेष महत्व
उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित पंचकेदारों में भगवान मध्यमेश्वर (मदमहेश्वर) को द्वितीय केदार के रूप में पूजा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव ने महिष (भैंस) का रूप धारण किया था। जब भीम ने उन्हें पहचान लिया, तो भगवान शिव धरती में समाने लगे। इस दौरान उनके शरीर के विभिन्न भाग पंचकेदारों के रूप में प्रकट हुए। मध्यमेश्वर धाम में भगवान शिव के मध्य भाग यानी ‘नाभि’ की पूजा की जाती है। यह मंदिर चौखंबा शिखर के आधार पर अत्यंत सुंदर और शांत मखमली बुग्यालों के बीच स्थित है, जो अपनी अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।






