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Uttarakhand :सर्वे ऑफ इंडिया में मेक इन इंडिया के नाम पर करोड़ों का घोटाला! दो करोड़ की मशीनें बेची जा रहीं 5.42 करोड़ में

On: November 12, 2025 5:28 AM
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देहरादून: सर्वे ऑफ इंडिया में प्लाटर मशीनों की खरीद को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। शिकायत के अनुसार, ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर महज दो करोड़ रुपये कीमत की मशीनों को लगभग 5.42 करोड़ रुपये में खरीदा जा रहा है। यह आरोप एचपी कंपनी के अधिकृत डीलर वाइडप्रिंट सिस्टम्स एंड सॉल्यूशंस के सीईओ केडी भारद्वाज ने लगाए हैं। उन्होंने मामले की विस्तृत जांच और टेंडर निरस्त करने की मांग की है।
भारद्वाज ने सर्वेयर जनरल और चीफ विजिलेंस ऑफिसर को भेजी शिकायत में कहा है कि यह पूरा खेल ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर रचा गया है। आरोप है कि महज 11 मशीनों की खरीद में ही विभाग को करीब 8.8 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान पहुंचाने की साजिश की जा रही है।
शिकायत के मुताबिक, जब मशीनों की खरीद प्रक्रिया शुरू हुई थी और प्री-बिड मीटिंग आयोजित की गई थी, तब ही इस मुद्दे को उठाया गया था। बावजूद इसके, सर्वे ऑफ इंडिया के वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे नजरअंदाज कर दिया।
भारद्वाज ने दावा किया कि वर्तमान में भारत में कोई भी कंपनी ‘मेक इन इंडिया’ के तहत प्लाटर मशीनें नहीं बनाती। इसके बावजूद जेम (GeM) पोर्टल पर जारी टेंडर में रेप्रोग्राफिक्स नामक कंपनी ने जापान की एक निर्माता कंपनी के साथ समझौते के आधार पर भाग लिया। इस कंपनी ने मशीन में केवल एक छोटा पुर्जा जोड़कर उसे ‘मेक इन इंडिया’ घोषित कर दिया।
इस कथित प्रक्रिया के चलते बाकी कंपनियों को टेंडर में भाग लेने का मौका ही नहीं मिला। शिकायत में कहा गया है कि एकमात्र प्रतिभागी कंपनी होने का लाभ उठाकर दो करोड़ रुपये की मशीनों की कीमत 5.42 करोड़ रुपये तक बढ़ा दी गई।
शिकायतकर्ता का कहना है कि इस अनुबंध के तहत आने वाले वर्षों में सर्वे ऑफ इंडिया को करोड़ों रुपये का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने जांच बैठाने, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने और टेंडर रद्द करने की मांग की है।
वहीं, सर्वे ऑफ इंडिया के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जिस कंपनी को टेंडर दिया गया है, उसके पास ‘मेक इन इंडिया’ प्रमाणपत्र उपलब्ध है। अधिकारी ने कहा कि यदि प्रमाणपत्र फर्जी पाया जाता है तो शिकायतकर्ता को इसे संबंधित सक्षम एजेंसी के समक्ष उठाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि प्लाटर की कीमतों के अंतर को लेकर उनके पास कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है, और वे केवल टेंडर कमेटी की सिफारिश के आधार पर निर्णय लेते हैं।
इस मामले ने विभाग के भीतर हलचल मचा दी है। अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि जांच के बाद ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर हुए इस कथित घोटाले की सच्चाई आखिर कब सामने आएगी।

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