उत्तराखंड में ग्राम पंचायतों के प्रशासकों का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही एक संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। 7478 ग्राम पंचायतें फिलहाल प्रशासकों से खाली हो चुकी हैं, जबकि क्षेत्र और जिला पंचायतों के प्रशासकों का कार्यकाल भी जल्द ही समाप्त होने वाला है। राज्य में फिलहाल कोई निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधि नहीं हैं, जिससे जमीनी प्रशासन प्रभावित हो रहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पर स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है, और अब गेंद राज्य निर्वाचन आयोग के पाले में है। चुनाव की तिथि और कार्यक्रम तय करने की जिम्मेदारी आयोग की है, और सरकार उसके निर्देशों का पालन करेगी। हालांकि इस बीच, सरकार ने पंचायतों में प्रशासनिक शून्यता से बचने के लिए प्रशासकों का कार्यकाल बढ़ाने के उद्देश्य से एक अध्यादेश तैयार कर राजभवन को भेजा है, जिसकी मंजूरी का इंतजार है।
उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम के अनुसार किसी पंचायत में प्रशासक केवल छह महीने के लिए ही नियुक्त किए जा सकते हैं। लेकिन पंचायत चुनावों की स्थिति अभी तक साफ नहीं है, इसीलिए सरकार ने प्रशासकों का कार्यकाल एक वर्ष तक बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा है। यदि समय रहते राजभवन से मंजूरी नहीं मिलती, तो राज्य की पंचायती व्यवस्था पूरी तरह ठप हो सकती है।
अब सभी की निगाहें राज्य निर्वाचन आयोग और राजभवन पर टिकी हैं, जहां से अगली दिशा तय होगी। इस संवेदनशील स्थिति में, सवाल यह भी उठता है कि क्या जनता को बिना प्रतिनिधित्व के और अधिक समय तक रहना होगा, या जल्द ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत नए पंच-सरपंच चुने जाएंगे?








