नैनीताल हाई कोर्ट में न्यायिक आदेशों के अनुपालन में लापरवाही का आलम ये है कि अब तक 1000 से अधिक अवमानना याचिकाएं लंबित हो चुकी हैं। उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण से लेकर जिला पंचायतों में प्रशासकों की नियुक्ति जैसे मामलों में हाई कोर्ट को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा। स्थिति यह है कि याचिकाकर्ताओं को एक आदेश के पालन के लिए भी कई बार कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, जिससे “तारीख पर तारीख” वाली न्याय प्रणाली की छवि और गहरी होती जा रही है।
राज्य सरकार के अनेक विभागों में हाई कोर्ट के आदेशों को समय पर न लागू करना आम बात बन गई है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार अधिकांश अवमानना याचिकाएं राज्य सरकार से जुड़ी हैं। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा उपनल कर्मचारियों को नियमित करने के स्पष्ट निर्देश के बावजूद इन्हें अनदेखा किया गया, जिससे अंततः अधिकारियों के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी हुए। इसी तरह चमोली जिला पंचायत के मामले में हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही आदेश का पालन हुआ।
न्यायिक आदेशों के अनुपालन में देरी का सीधा असर अदालतों पर पड़ रहा है। नैनीताल हाई कोर्ट में ही 57 हजार से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें 1154 अवमानना याचिकाएं हैं। अवमानना की स्थिति तब पैदा होती है जब अधिकारी जानबूझकर या तकनीकी अज्ञानता के चलते आदेशों को समय पर लागू नहीं करते। कई बार तो याचिका दाखिल होने के बाद ही अधिकारी आदेशों का पालन करते हैं ताकि व्यक्तिगत जवाबदेही से बचा जा सके।
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी सभी मंत्रालयों को निर्देश जारी किए हैं कि वे न्यायिक आदेशों के पालन के लिए एक सुनिश्चित और समयबद्ध व्यवस्था विकसित करें। यदि राज्य सरकारें और उनके विभाग आदेशों का स्वतः पालन करने की जिम्मेदारी लें, तो न केवल आम जनता को समय पर न्याय मिलेगा, बल्कि न्यायालयों का बोझ भी कम होगा और लोगों का भरोसा न्याय प्रणाली पर और मजबूत होगा।
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