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उत्तराखंड की नदियों को प्रदूषण से बचाने हेतु सात परियोजनाओं की डीपीआर तैयार, 225 करोड़ की लागत तय

On: October 4, 2025 5:12 AM
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सात कस्बों में लगेंगे जल शोधन संयंत्र

हिमालय की गोद से निकलने वाली नदियां सदियों से उत्तराखंड की जीवनरेखा रही हैं। ये नदियां न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि सिंचाई, पेयजल और पर्यटन का भी प्रमुख आधार रही हैं। मगर तेजी से बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण अब यही नदियां प्रदूषण के खतरे से जूझ रही हैं। हर दिन लाखों लीटर दूषित पानी भगीरथी, अलकनंदा, बालगंगा और यमुना जैसी नदियों में गिर रहा है, जिससे उनकी पवित्रता और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ रहा है।

इस गंभीर समस्या को देखते हुए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत उत्तराखंड के सात कस्बों में प्रयुक्त जल शोधन संयंत्र (Sewage Treatment Plant) स्थापित किए जाएंगे। इन परियोजनाओं पर कुल 225 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जिसमें 203 करोड़ केंद्र सरकार और 22 करोड़ रुपये राज्य सरकार देगी।

सात कस्बों में प्रमुख परियोजनाएं

इन संयंत्रों की डीपीआर तैयार की जा चुकी है और इन्हें नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स को भी भेजा गया है ताकि तकनीकी सुझावों को शामिल किया जा सके।

चिन्यालीसौड़ – भगीरथी नदी

सतपुली – नयार नदी

घनसाली – भिलंगना नदी

चमीला – बालगंगा नदी

पुरोला – यमुना की सहायक नदी

बड़कोट – यमुना नदी

पौड़ी – लोअर चोप्ता गदेरा

संयंत्रों से होगा लाभ

इन प्लांट्स के माध्यम से प्रतिदिन 58 लाख लीटर दूषित जल को नदियों में जाने से रोका जा सकेगा। इसका शोधन कर इसे पुनः प्रयोग योग्य बनाया जाएगा और केवल साफ पानी ही नदियों में छोड़ा जाएगा।

प्रदूषित जल से होने वाले खतरे

नदियों की पवित्रता और धार्मिक महत्व पर असर।

ऑक्सीजन की कमी से जल जीव-जंतु प्रभावित।

दूषित जल से सिंचाई और पेयजल अनुपयोगी हो जाता है।

बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों के फैलाव से स्वास्थ्य पर खतरा।

डिटर्जेंट, तेल, रसायन और प्लास्टिक कचरा जलीय जीवन को नष्ट करता है।

नदी का पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।

वर्तमान स्थिति

राज्य में प्रतिदिन 85.6 मिलियन लीटर पानी उपयोग होता है, लेकिन प्रयुक्त जल प्रबंधन की रफ्तार बेहद धीमी है। अब तक केवल सात परियोजनाओं की डीपीआर ही तैयार हो सकी है, जबकि राज्य के शहरी क्षेत्रों में और भी कई जगह इस तरह के संयंत्रों की आवश्यकता है।

यह कदम न सिर्फ नदियों की स्वच्छता और धार्मिक महत्त्व को बचाएगा, बल्कि पर्यटन और स्थानीय लोगों की आजीविका की रक्षा में भी अहम भूमिका निभाएगा।

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