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Uttarakhand NH Projects: 7 जिलों के 19 नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स अटके, Forest Clearance में देरी बनी बड़ी बाधा!

On: August 31, 2026 8:10 AM
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Uttarakhand NH Projects affected by Forest Clearance delays across 7 districts

Uttarakhand NH Projects उत्तराखंड में सड़कों का नेटवर्क मजबूत करने के लिए चल रही कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर एक बार फिर Forest Clearance की प्रक्रिया भारी पड़ती दिखाई दे रही है। प्रदेश के सात जिलों में राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़ी 19 परियोजनाएं जरूरी वन संबंधी औपचारिकताओं के कारण प्रभावित हो रही हैं। इनमें कुछ परियोजनाएं अंतरराष्ट्रीय सीमा से जुड़े इलाकों में प्रस्तावित हैं, इसलिए इनका महत्व केवल यातायात तक सीमित नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से भी काफी ज्यादा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पांडे ने प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु को पत्र लिखकर लंबित स्वीकृतियों की प्रक्रिया में तेजी लाने का आग्रह किया है। विभाग का कहना है कि इन परियोजनाओं में देरी होने से विकास कार्य प्रभावित होने के साथ-साथ लागत बढ़ने का खतरा भी बना रहता है।

19 Uttarakhand NH Projects पर फॉरेस्ट क्लीयरेंस का पेंच

उत्तराखंड में बड़े हिस्से पर वन क्षेत्र होने के कारण सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को अक्सर वन भूमि से गुजरना पड़ता है। ऐसे मामलों में Forest Clearance के साथ वन भूमि हस्तांतरण, पेड़ों के कटान की अनुमति और दूसरी पर्यावरणीय औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं।

यही प्रक्रिया कई बार परियोजनाओं की गति को धीमा कर देती है। राज्य स्तर पर फाइल तैयार होने के बाद कई मामलों में अंतिम स्वीकृति केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से जुड़ी होती है। नतीजतन एक छोटी प्रशासनिक देरी भी बड़े प्रोजेक्ट की समयसीमा पर असर डाल सकती है।

सड़कों की परियोजनाओं पर ज्यादा असर

Uttarakhand NH Projects में सड़क निर्माण से जुड़ी योजनाएं वन स्वीकृति के मामले में सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। पहाड़ी इलाकों में सड़क को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए वन क्षेत्र का उपयोग करना पड़ता है। कई जगह पेड़ों के कटान और वन भूमि के उपयोग की आवश्यकता भी सामने आती है।

ऐसी स्थिति में परियोजना शुरू करने से पहले कई स्तरों पर अनुमति लेनी होती है। पहले संबंधित विभागों के बीच प्रक्रिया आगे बढ़ती है और फिर जरूरी मामलों में केंद्र स्तर की मंजूरी का इंतजार करना पड़ता है। यदि यह प्रक्रिया लंबी होती है तो निर्माण शुरू होने में देरी के साथ लागत अनुमान भी बदल सकता है।

PWD सचिव ने प्रमुख सचिव वन को लिखा पत्र

लंबित परियोजनाओं की स्थिति को देखते हुए लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पांडे ने प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु को पत्र भेजा है। इस पत्र में फॉरेस्ट क्लीयरेंस से जुड़ी औपचारिकताओं को प्राथमिकता से पूरा करने की जरूरत बताई गई है।

पंकज कुमार पांडे के मुताबिक प्रदेश में कई परियोजनाओं में वन संबंधी औपचारिकताएं अभी पूरी होनी बाकी हैं। हालांकि बड़े और महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की हर महीने समीक्षा की जाती है। संबंधित अधिकारियों से समन्वय कर यह प्रयास किया जा रहा है कि जरूरी स्वीकृतियां जल्द हासिल हों।

उन्होंने कहा कि प्रमुख सचिव वन को पत्र लिखने का उद्देश्य भी यही है कि इन परियोजनाओं के महत्व को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों को तेजी से काम करने के निर्देश मिल सकें।

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सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रस्तावित कई परियोजनाएं

इन 19 Uttarakhand NH Projects की सबसे अहम बात यह है कि इनमें कई परियोजनाएं उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों से जुड़ी हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क संपर्क केवल स्थानीय लोगों की आवाजाही के लिए नहीं, बल्कि प्रशासन, सुरक्षा बलों और रणनीतिक गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है।

चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में प्रस्तावित कई सड़कें अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक हैं। ऐसे में इन परियोजनाओं की समय पर प्रगति सुरक्षा और कनेक्टिविटी दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

पिथौरागढ़ में सबसे ज्यादा 9 प्रोजेक्ट

जिलावार देखें तो पिथौरागढ़ में सबसे ज्यादा नौ परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें मिलम-डुंग, डुंग-टोपीडुंगा, तवाघाट-सोबला राष्ट्रीय राजमार्ग के दो हिस्से, कालापानी-ग्रैफु गाड़, जोलिंगकोंग-विल्शा बेस, जौलजीबी-मुनस्यारी-बैजनाथ मार्ग, काली मंदिर-लिपुलेख मार्ग और पिथौरागढ़-बागेश्वर सीमावर्ती क्षेत्र में उडियारी बैंड से कांदा तक का मार्ग शामिल है।

इनमें से कई सड़कें ऐसे क्षेत्रों में जाती हैं जहां सामान्य सड़क निर्माण की तुलना में भौगोलिक और प्रशासनिक चुनौतियां अधिक हैं। वन मंजूरी में देरी होने पर निर्माण प्रक्रिया और भी कठिन हो सकती है।

चमोली और उत्तरकाशी की महत्वपूर्ण सड़कें भी प्रभावित

चमोली जिले में तीन प्रमुख परियोजनाओं पर वन औपचारिकताओं का असर बताया गया है। इनमें माणा-माणापास, गेल्डुंग-नीतिपास और लपथल-दोबला सड़कें शामिल हैं।

उत्तरकाशी में नीला पानी-मूलिंग ला और त्रिपणी-रंगमंच गाड़ मार्ग को सूची में रखा गया है। ये परियोजनाएं दुर्गम और सीमावर्ती भूभाग में संपर्क मजबूत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

ऐसे क्षेत्रों में बेहतर सड़क संपर्क से स्थानीय आबादी के साथ सुरक्षा और प्रशासनिक पहुंच को भी मजबूती मिल सकती है।

अल्मोड़ा, नैनीताल, देहरादून और हरिद्वार की परियोजनाएं

वन स्वीकृति से प्रभावित योजनाएं केवल सीमा से लगे पर्वतीय जिलों तक सीमित नहीं हैं। अल्मोड़ा जिले की कंगारछीना-अल्मोड़ा सड़क, नैनीताल जिले की काठगोदाम-रूसी बाईपास परियोजना और देहरादून जिले में ऋषिकेश बाईपास तथा बढ़वाला-लखवार बैंड परियोजनाएं भी इस सूची में हैं।

हरिद्वार जिले की पुरकाजी-लक्सर-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना भी लंबित औपचारिकताओं के दायरे में बताई गई है। इससे स्पष्ट है कि Uttarakhand NH Projects में वन संबंधी मंजूरी की चुनौती केवल दूरदराज के सीमावर्ती क्षेत्रों की समस्या नहीं है।

देरी से बढ़ती है परियोजना की लागत

वन स्वीकृति मिलने में देरी का असर केवल निर्माण शुरू होने की तारीख पर नहीं पड़ता। परियोजना जितनी लंबी अवधि तक अटकी रहती है, निर्माण सामग्री, मजदूरी और अन्य खर्चों में बदलाव के कारण लागत बढ़ सकती है।

सरकारी विभागों के लिए यह अतिरिक्त वित्तीय बोझ बनता है। इसके साथ ही जिस क्षेत्र के विकास के लिए सड़क बनाई जानी है, वहां के लोगों को भी लंबे समय तक बेहतर कनेक्टिविटी का इंतजार करना पड़ता है।

यही वजह है कि विभाग अब लंबित औपचारिकताओं को जल्द पूरा कराने की कोशिश कर रहा है।

वन संरक्षण और विकास के बीच संतुलन जरूरी

वन क्षेत्रों में सड़क निर्माण को लेकर पर्यावरण संरक्षण भी महत्वपूर्ण पक्ष है। वन कानूनों का उद्देश्य जंगलों और जैव विविधता की रक्षा करना है। ऐसे में किसी भी परियोजना को मंजूरी देते समय पर्यावरणीय प्रभाव, पेड़ों की संख्या और वन भूमि के उपयोग जैसे पहलुओं का आकलन किया जाता है।

दूसरी तरफ सरकार के सामने सीमावर्ती और दूरदराज क्षेत्रों में सड़क संपर्क मजबूत करने की जरूरत भी है। वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र सेठी का कहना है कि सामरिक महत्व वाली परियोजनाओं में जिस तरह कुछ मामलों में प्रक्रियागत राहत दी जाती है, उसी प्रकार राज्य के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स के लिए भी व्यावहारिक समाधान तलाशने की जरूरत है।

उनका मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए जरूरी परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

हर महीने हो रही महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स की समीक्षा

PWD के अनुसार बड़े और महत्वपूर्ण Uttarakhand NH Projects की प्रगति पर नियमित निगरानी रखी जा रही है। संबंधित विभागों और अधिकारियों के साथ बैठकें कर अड़चनों को चिह्नित किया जाता है। अब प्रमुख सचिव वन को भेजे गए पत्र के बाद लंबित Forest Clearance मामलों में गति आने की उम्मीद है।

हालांकि अंतिम मंजूरी संबंधित कानूनी और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं के अनुसार ही होगी। विभाग की चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि जरूरी औपचारिकताओं को जल्द से जल्द पूरा किया जाए, ताकि परियोजनाएं अनिश्चितकाल तक लंबित न रहें।

अब मंजूरी पर टिकी 19 परियोजनाओं की रफ्तार

उत्तराखंड के सात जिलों में 19 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं पर Forest Clearance का पेंच फिलहाल बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। इनमें कई योजनाएं सीमावर्ती क्षेत्रों से जुड़ी होने के कारण विशेष महत्व रखती हैं।

PWD के पत्र के बाद अब निगाह इस बात पर है कि वन विभाग और केंद्र स्तर पर लंबित प्रक्रियाएं कितनी तेजी से आगे बढ़ती हैं। परियोजनाओं को समय पर मंजूरी मिलने से न केवल कनेक्टिविटी मजबूत होगी, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में पहुंच, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामरिक ढांचे को भी लाभ मिल सकता है।

फिलहाल Uttarakhand NH Projects की प्रगति को लेकर सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विकास की जरूरतों और वन संरक्षण के नियमों के बीच संतुलन बनाते हुए लंबित परियोजनाओं को जमीन पर उतारा जाए।

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