देवभूमि उत्तराखंड के दूर-दराज और खूबसूरत पहाड़ी गांवों में Uttarakhand Homestay Scheme ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित हो रही है। कभी पलायन के दंश से वीरान हो रहे गाँव अब पर्यटकों की चहल-पहल से गुलजार हैं। राज्य सरकार की प्रभावी नीतियों और स्थानीय युवाओं की मेहनत के दम पर आज प्रदेश में 5,000 से अधिक पंजीकृत होमस्टे संचालित हो रहे हैं। इस दूरदर्शी पहल ने न केवल पर्यटन को नई दिशा दी है, बल्कि 6,500 से अधिक प्रवासी युवाओं को वापस अपने गाँव लौटकर स्वरोजगार अपनाने की प्रेरणा भी दी है।
पहाड़ों में होमस्टे की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि ग्रामीण अंचलों में होमस्टे स्वरोजगार का एक मजबूत और सशक्त माध्यम बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि सरकार का मुख्य संकल्प पहाड़ के युवाओं को उनके घर में ही सम्मानजनक आजीविका देना है ताकि पलायन पर प्रभावी अंकुश लग सके। प्रवासियों की अपने गाँव वापसी इस बात का प्रमाण है कि सरकारी नीतियां धरातल पर रंग ला रही हैं।
Uttarakhand Homestay Scheme: सब्सिडी और सरकारी सुविधाओं का पूरा ब्योरा
उत्तराखंड सरकार द्वारा ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय गृह आवास (होमस्टे) विकास योजना’ के अंतर्गत ग्रामीणों और युवाओं को कई तरह की आर्थिक व ढांचागत सुविधाएं दी जा रही हैं। Uttarakhand Homestay Scheme के तहत पर्वतीय क्षेत्रों में नया होमस्टे बनाने या पुराने पैतृक घर के नवीनीकरण के लिए कुल लागत का 33% से 50% तक (अधिकतम ₹1.5 लाख से ₹10 लाख तक) कैपिटल सब्सिडी दी जा रही है।
इसके अलावा, योजना के तहत संचालकों को वित्तीय राहत देने के लिए निम्नलिखित सुविधाएं शामिल हैं:
- ब्याज अनुदान: शुरुआती कुछ वर्षों के लिए बैंक लोन के ब्याज पर 50% तक की छूट।
- घरेलू दरें: व्यावसायिक कर के बोझ से बचाने के लिए बिजली और पानी के बिल घरेलू दरों पर।
- कर प्रतिपूर्ति: शुरुआती वर्षों में जमा किए गए SGST की शत-प्रतिशत प्रतिपूर्ति।
- निःशुल्क प्रशिक्षण: पर्यटन विभाग द्वारा आतिथ्य, स्वच्छता, खाना बनाने और विदेशी पर्यटकों से संवाद के लिए भाषा का मुफ्त प्रशिक्षण।
- ऑनलाइन लिस्टिंग: राज्य पर्यटन विकास परिषद के पोर्टल पर मुफ्त लिस्टिंग और वैश्विक प्रचार।
रिवर्स पलायन से बदली जिंदगी: दिल्ली छोड़ गाँव लौटे युवा
दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े शहरों में छोटी-मोटी नौकरियां करने वाले कई युवा अब अपने घर लौटकर महीने के लाखों रुपये कमा रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल के खिर्सू गाँव में होमस्टे चलाने वाले रमेश उनियाल ने बताया कि वे 8 साल तक दिल्ली में नौकरी कर रहे थे, जहाँ बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता था। सरकार की सब्सिडी योजना की जानकारी मिलते ही उन्होंने अपने पुराने पैतृक मकान को सजा-संवारकर होमस्टे में बदल दिया। आज उनके पास देश-विदेश से पर्यटक आते हैं और वे गांव के अन्य युवाओं को भी रोजगार दे रहे हैं।
इसी तरह उत्तरकाशी की सुनीता देवी का कहना है कि इस योजना से महिलाओं को सबसे बड़ा आर्थिक सहारा मिला है। होमस्टे में आने वाले पर्यटकों को स्थानीय पहाड़ी व्यंजन जैसे गहत की दाल, मंडुवे की रोटी और झंगोरे की खीर काफी पसंद आ रही है।
Uttarakhand Homestay Scheme: पर्यटकों को मिल रहा प्रकृति और लोक-संस्कृति का अहसास
उत्तराखंड के इन होमस्टे में ठहरने वाले पर्यटक यहाँ के शांत वातावरण और स्थानीय लोक-संस्कृति के मुरीद हो रहे हैं। मुंबई से पिथौरागढ़ घूमने आईं नेहा शर्मा ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि बड़े होटलों की तुलना में गाँव के होमस्टे में रुकना बेहद सुखद रहा। सुबह पक्षियों की चहचहाहट, हिमालय का विहंगम दृश्य, चूल्हे पर बना ताजा पारंपरिक खाना और स्थानीय कहानियों का अनुभव किसी भी महंगे सितारा होटल में नहीं मिल सकता।
Uttarakhand Homestay Scheme ने राज्य में पर्यटन की अवधारणा को पारंपरिक होटलों से हटाकर प्राकृतिक और ग्रामीण परिवेश की ओर मोड़ा है। यह पहल न केवल रिवर्स पलायन को बढ़ावा दे रही है, बल्कि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति, हस्तशिल्प और पारंपरिक खान-पान का संरक्षण भी कर रही है। सरकार के निरंतर सहयोग और स्थानीय लोगों के प्रयास से उत्तराखंड के गाँव आज आत्मनिर्भरता और समृद्धि की नई कहानी लिख रहे हैं।
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