देहरादून। उत्तराखंड सरकार समान नागरिक संहिता (यूसीसी) में एक अहम बदलाव करने जा रही है, जिससे हजारों लोगों को राहत मिलने की संभावना है। नए संशोधन के तहत, यदि 27 मार्च 2010 के बाद हुए किसी विवाह में उस समय पति या पत्नी में से कोई एक नाबालिग था और अब दोनों की आयु 22 वर्ष पूरी हो चुकी है, तो ऐसे विवाहों का पंजीकरण किया जा सकेगा।
हालांकि यह राहत केवल उन्हीं विवाहों को मिलेगी जो उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने से पहले संपन्न हुए थे। नए नियम लागू होने के बाद किए गए विवाहों पर यह छूट लागू नहीं होगी। गृह विभाग इस संबंध में नियमावली में संशोधन करने की प्रक्रिया में जुटा है।
राज्य में 27 जनवरी 2025 से समान नागरिक संहिता लागू कर दी गई है। इसके तहत स्पष्ट प्रावधान है कि 27 मार्च 2010 के बाद हुए सभी विवाहों का अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा। साथ ही नियमावली में यह भी व्यवस्था दी गई थी कि यदि विवाह के समय दोनों में से कोई एक पक्ष नाबालिग था, तो उस विवाह का पंजीकरण संभव नहीं होगा।
लेकिन, अब शासन के सामने ऐसे कई पुराने मामले आए, जहां विवाह तो पूर्व में हो चुका है, लेकिन वर्तमान में दोनों साथी वयस्क हैं और सामान्य पारिवारिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ऐसे में पंजीकरण न होने से उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में वैध दंपती के रूप में मान्यता नहीं मिल पा रही थी।
गत दिनों मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई। बैठक में यह महसूस किया गया कि ऐसे मामलों में पंजीकरण न होने से अनावश्यक सामाजिक और कानूनी जटिलताएं उत्पन्न हो रही हैं।
अब गृह विभाग नियमावली में संशोधन करते हुए यह प्रावधान जोड़ने जा रहा है कि यदि किसी विवाह में अब दोनों पक्ष 22 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं और विवाह समान नागरिक संहिता लागू होने से पूर्व हुआ है, तो ऐसे मामलों में विवाह का पंजीकरण किया जा सकेगा।
गृह सचिव शैलेश बगौली ने स्पष्ट किया कि यह छूट केवल पुराने विवाहों पर ही लागू होगी। समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद यदि कोई विवाह इसी तरह के हालात में होता है तो उसमें यह राहत नहीं दी जाएगी।
इस संशोधन के बाद प्रदेश में वर्षों पुराने ऐसे कई मामलों को वैधानिक पहचान मिलने का रास्ता साफ होगा, जिनमें केवल उम्र के कारण विवाह पंजीकरण में बाधा आ रही थी।
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू करने वाला यह संशोधन सामाजिक व्यवहारिकता और कानूनी आवश्यकताओं के बीच संतुलन साधने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
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