मुख्य बिंदु:
- चुनावी बुगबुगाहट: उत्तराखंड में तय समय से पहले इस साल नवंबर-दिसंबर में विधानसभा चुनाव होने की अटकलें तेज।
- त्रिकोणीय प्रशासनिक पेच: अगले साल की शुरुआत में हरिद्वार अर्द्धकुंभ, राष्ट्रीय जनगणना और बोर्ड परीक्षाएं बनीं वजह।
- सियासी सरगर्मी: भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के ताबड़तोड़ दौरों ने राज्य का सियासी पारा चढ़ाया।
पूरी खबर: देवभूमि में समय से पहले चुनावी शंखनाद की सुगबुगाहट
देहरादून: उत्तराखंड के सियासी गलियारों में इन दिनों एक बेहद चौंकाने वाली सुगबुगाहट तेजी से तैर रही है। राज्य की राजनीतिक फिजाओं में यह चर्चा जोरों पर है कि उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव अपने तय समय से काफी पहले, यानी इसी साल नवंबर या दिसंबर के महीने में आयोजित कराए जा सकते हैं। हालांकि, इस संवेदनशील विषय पर अभी तक सत्ता पक्ष या विपक्ष के किसी भी शीर्ष नेता अथवा निर्वाचन आयोग की तरफ से आधिकारिक रूप से कोई कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है।
लेकिन, परदे के पीछे चल रही प्रशासनिक तैयारियां, राज्य में केंद्रीय स्तर के दिग्गज नेताओं के लगातार हो रहे दौरे, इंटेलिजेंस (एसआईआर) की तेजी से सक्रिय हुई प्रक्रिया और आने वाले समय के महत्वपूर्ण आयोजनों को देखकर राजनीतिक विश्लेषक इसे समय से पहले चुनाव के पुख्ता संकेत मान रहे हैं।
कार्यकाल मार्च 2027 में हो रहा है पूरा, पर स्थितियां अलग
आपको बता दें कि उत्तराखंड की वर्तमान पांचवीं विधानसभा का वैधानिक कार्यकाल अगले साल 23 मार्च को समाप्त होने जा रहा है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत इससे पहले राज्य में छठवीं विधानसभा के गठन के लिए आम चुनाव संपन्न कराए जाने अनिवार्य हैं। उत्तराखंड के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो अमूमन यहाँ विधानसभा चुनाव फरवरी के मध्य या मार्च के प्रथम सप्ताह में होते आए हैं।
इस अवधि के दौरान राज्य का मौसम भी चुनावी रैलियों और मतदान के लिहाज से बेहद अनुकूल रहता है।
परंतु, इस बार राज्य में जो अभूतपूर्व परिस्थितियां बन रही हैं, वे साफ तौर पर इशारा कर रही हैं कि सरकार और निर्वाचन तंत्र फरवरी-मार्च का इंतजार करने के बजाय इसी साल के अंत में चुनाव कराने का बड़ा फैसला ले सकते हैं
समझिए वो ‘त्रिकोणीय पेच’ जिसके चलते समय से पहले चुनाव की है मजबूरी
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि समय से पहले चुनाव कराने के पीछे कोई विशुद्ध रूप से राजनीतिक या रणनीतिक कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन बड़े व्यवहारिक और प्रशासनिक पेच फंसे हुए हैं। अगर चुनाव समय पर यानी फरवरी-मार्च में कराए जाते हैं, तो सरकारी मशीनरी के सामने व्यवस्थाओं को संभालना असंभव सा हो जाएगा। आइए समझते हैं कि ये त्रिकोणीय पेच क्या हैं:
1. हरिद्वार में भव्य अर्द्धकुंभ का महाआयोजन
पहला और सबसे बड़ा पेच है अगले साल 14 जनवरी से धर्मनगरी हरिद्वार में शुरू होने जा रहा भव्य ‘अर्द्धकुंभ मेला’। इस वैश्विक धार्मिक महाआयोजन में देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालुओं के उत्तराखंड पहुंचने की उम्मीद है। अर्द्धकुंभ के सफल और सुरक्षित संपादन के लिए राज्य के पूरे प्रशासनिक अमले, पुलिस बल और वरिष्ठ अधिकारियों को महीनों पहले से वहां जुटना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में उसी दौरान चुनाव कराना कानून-व्यवस्था और सुरक्षा बल के प्रबंधन के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।
2. राष्ट्रीय जनगणना की महाप्रक्रिया
दूसरा बड़ा पेच है अगले साल फरवरी महीने से प्रस्तावित राष्ट्रीय जनगणना (National Census)। जनगणना एक बेहद विस्तृत और समय लेने वाली प्रक्रिया है, जिसमें राजस्व विभाग के अधिकारियों से लेकर ब्लॉक और जिला स्तर के पूरे प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह झोंकना पड़ता है। एक ही समय पर जनगणना और विधानसभा चुनाव जैसी दो विशाल राष्ट्रव्यापी प्रक्रियाओं को संभालना राज्य की सीमित मशीनरी के लिए एक बड़ी मुसीबत साबित हो सकता है।
3. मार्च में होने वाली बोर्ड परीक्षाएं और पोलिंग बूथ की समस्या
तीसरा व्यावहारिक पेच है मार्च महीने में आयोजित होने वाली उत्तराखंड बोर्ड और केंद्रीय बोर्ड (CBSE) की परीक्षाएं। इन परीक्षाओं के आयोजन में राज्य के सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षक और स्टाफ पूरी तरह व्यस्त रहते हैं। चूंकि चुनाव में अधिकांश पोलिंग बूथ स्कूलों में ही बनाए जाते हैं और शिक्षकों की ड्यूटी मतदान कर्मियों के रूप में लगाई जाती है, इसलिए मार्च में चुनाव होने की स्थिति में परीक्षाओं और मतदान दोनों का गणित पूरी तरह गड़बड़ा जाएगा।
इन तीनों बड़े व्यावहारिक कारणों को देखते हुए यदि मार्च से पहले चुनाव नहीं कराए गए, तो प्रशासनिक मशीनरी के सामने एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। यही वजह है कि नवंबर-दिसंबर का समय चुनाव के लिए सबसे मुफीद माना जा रहा है।
शीर्ष नेताओं के दौरों ने चढ़ाया पारा, दोनों दल तैयारियों में जुटे
भले ही चुनावों की तारीखों को लेकर अभी सस्पेंस बना हुआ हो, लेकिन राज्य के दोनों प्रमुख सियासी दल—सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस (Congress)—अंदरूनी तौर पर चुनावी मोड में आ चुके हैं। दोनों ही दलों ने अपनी सांगठनिक तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है।
भाजपा का ताबड़तोड़ चुनावी शंखनाद
भारतीय जनता पार्टी समय से पहले चुनाव की संभावनाओं को देखते हुए जमीन पर सबसे ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है। भाजपा की ओर से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता लगातार उत्तराखंड का दौरा कर विकास योजनाओं की सौगात दे रहे हैं और अप्रत्यक्ष रूप से चुनावी शंखनाद कर चुके हैं। इसके अलावा भाजपा के प्रदेश चुनाव प्रभारी नितिन नवीन भी लगातार उत्तराखंड के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने और फीडबैक लेने में जुटे हुए हैं।
कांग्रेस भी नहीं है पीछे, प्रभारियों ने संभाली कमान
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी सत्ता में वापसी के लिए पूरा जोर लगा रही है। कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और ‘युवराज’ राहुल गांधी भी पिछले दिनों राज्य के दौरे पर आए थे। यह बात अलग है कि ऐन वक्त पर खराब मौसम की मार के कारण उनका यह दौरा उस तरह परवान नहीं चढ़ पाया जैसी उम्मीद की जा रही थी। अलबत्ता, कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा लगातार उत्तराखंड के विभिन्न जिलों का दौरा कर पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंक रही हैं और गुटबाजी को खत्म कर चुनावी तैयारियों को मजबूत करने में जुटी हैं।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड में प्रशासनिक विवशताओं और राजनीतिक सरगर्मियों को देखकर साफ है कि इस बार सर्दियों के मौसम में ही देवभूमि का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंचने वाला है। अब देखना यह होगा कि इस त्रिकोणीय पेच के बीच चुनाव आयोग कब और किस तरह से चुनावों का आधिकारिक ऐलान करता है।







