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उत्तराखंड : मसूरी गोलीकांड की 31वीं वर्षगांठ, सीएम धामी ने शहीद आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की

On: September 2, 2025 7:47 AM
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दो सितंबर 1994 की वह भयानक घटना आज भी लोगों की यादों में डर और शोक भर देती है। इस दिन पुलिस ने निहत्थे छह उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों पर गोलियों की बौछार कर दी थी। मसूरी के इतिहास में यह दिन हमेशा के लिए एक काला अध्याय बन गया।

आज मसूरी में मसूरी गोलीकांड की 31वीं बरसी के अवसर पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शहीद आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि दी। मालरोड स्थित शहीद स्थल पर सीएम ने राय सिंह बंगारी, मदन मोहन ममगाईं, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, बलबीर नेगी और धनपत सिंह सहित सभी बलिदानियों को याद किया।

गोलीकांड की दर्दनाक स्मृतियाँ

बलिदानी बलबीर नेगी के छोटे बेटे बिजेंद्र नेगी ने बताया कि 2 सितंबर 1994 को आंदोलनकारियों की रैली चल रही थी, जिसमें उनके भाई बलबीर नेगी भी शामिल थे। पुलिस ने उनके भाई को एक गोली सीने में और दो गोली पेट में मार दी थी। इस अत्याचार की सच्चाई आज भी लोगों को सिहरने पर मजबूर कर देती है। वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी जयप्रकाश उत्तराखंडी ने बताया कि उस समय उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति की बैठक चल रही थी।

लंबा संघर्ष और राज्य की प्राप्ति

उत्तराखंड राज्य आंदोलन की लंबी लड़ाई और शहादतों के बाद आखिरकार यह क्षेत्र अलग राज्य बन पाया। लेकिन उस समय की हिंसा और अत्याचार के जख्म आज भी ताज़ा हैं। 1 सितंबर 1994 को खटीमा में पुलिस ने राज्य आंदोलनकारियों के जुलूस पर फायरिंग की थी। इसके विरोध में 2 सितंबर को मसूरी में शांतिपूर्ण बंद और विरोध प्रदर्शन हुआ। रात को झूलाघर स्थित उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के कार्यालय पर पुलिस और पीएसी ने कब्जा कर उसे छावनी बना दिया और 46 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

बर्बर गोलीकांड और शहादत

आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी के तुरंत बाद मसूरी में बर्बर गोलीकांड हुआ। राय सिंह बंगारी, मदन मोहन ममगाईं, हंसा धनाई, बेलमती चौहान, बलबीर नेगी और धनपत सिंह ने इस हिंसा में अपनी जानों की आहुति दी। वरिष्ठ आंदोलनकारी देवी प्रसाद गोदियाल ने कहा कि आज भी आंदोलनकारियों के सपनों का प्रदेश पूरी तरह नहीं बन सका। राजधानी गैरसैंण आज तक नहीं बन पाई और पहाड़ों में पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जल-जंगल-जमीन की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

मसूरी गोलीकांड हमें याद दिलाता है कि राज्य आंदोलन सिर्फ एक राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि इसमें अनगिनत शहादतें और बलिदान शामिल थे, जिन्होंने उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने में अहम भूमिका निभाई।

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