उत्तराखंड में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक बार फिर अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश में जुट गई है। राज्य निर्माण के बाद बसपा का राज्य में खासा प्रभाव रहा है। साल 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 10.93% मत प्राप्त कर 7 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2007 में यह आंकड़ा बढ़कर 8 सीटों तक पहुंचा, और 2012 में वोट प्रतिशत 12.19% तक पहुंच गया। हालांकि सीटें घटकर 3 रह गई थीं। इसके बाद पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरता चला गया। वर्ष 2022 तक बसपा का मत प्रतिशत घटकर 4.9% रह गया, और फिलहाल पार्टी का केवल एक विधायक विधानसभा में मौजूद है।
अब बसपा पंचायत चुनावों को अगले विधानसभा चुनाव (2027) की तैयारी के रूप में देख रही है। खासकर मैदानी जिलों—जैसे ऊधम सिंह नगर, देहरादून, नैनीताल और अल्मोड़ा—में पार्टी नए सिरे से संगठन को सक्रिय कर रही है। हरिद्वार, जो बसपा का पारंपरिक गढ़ रहा है, वहां इस बार चुनाव नहीं हो रहे हैं, इसलिए पार्टी का फोकस अन्य 12 जिलों पर है। संभावित प्रत्याशियों के साथ बैठकों का दौर शुरू हो चुका है और स्थानीय स्तर पर जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनाई जा रही है।
पिछले पंचायत चुनावों में बसपा समर्थित उम्मीदवारों ने ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और पंचायत सदस्य जैसे पदों पर अच्छा प्रदर्शन किया था, खासकर अनुसूचित जाति और मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में। यह वोट बैंक पहले बसपा की ताकत रहा है, लेकिन बीते वर्षों में इसमें काफी सेंध लगी है। अब पार्टी इन्हीं समुदायों के साथ-साथ अन्य सामाजिक वर्गों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
बसपा की यह रणनीति न सिर्फ पंचायत स्तर पर अपनी जड़ें मजबूत करने की है, बल्कि इसका उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनावों के लिए ठोस जनाधार तैयार करना भी है। मैदानी इलाकों में सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए बसपा एक बार फिर राज्य की तीसरी बड़ी ताकत बनने का दावा पेश कर रही है।
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