राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था इस समय गहरे संवैधानिक संकट से गुजर रही है। 10760 पंचायतें वर्तमान में नेतृत्व विहीन हो चुकी हैं क्योंकि प्रशासकों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और उनके पुनर्नियुक्ति के अध्यादेश को राजभवन ने मंजूरी देने से इनकार कर दिया है। इस निर्णय के चलते गांव से लेकर ज़िला स्तर तक की पंचायती संरचना ठप पड़ी हुई है।
पंचायती राज विभाग ने प्रशासनिक खालीपन को भरने के लिए तुरंत एक नया अध्यादेश तैयार किया था, ताकि प्रशासकों की पुनर्नियुक्ति की जा सके। लेकिन विधायी विभाग ने इसे पहले ही यह कहकर खारिज कर दिया था कि एक बार अस्वीकृत अध्यादेश को उसी रूप में दोबारा लाना संविधान की भावना के खिलाफ होगा। इसके बावजूद विभाग ने अध्यादेश को राजभवन को भेज दिया।
राज्यपाल सचिवालय ने स्पष्ट किया कि विधायी विभाग की आपत्तियों को हल किए बिना यह प्रस्ताव भेजा गया था, जिसे कानूनी अस्पष्टताओं के चलते वापस कर दिया गया है। राजभवन की ओर से यह भी बताया गया कि कुछ कानूनी बिंदुओं की जांच की जा रही है और जब तक सब कुछ स्पष्ट नहीं होता, अध्यादेश को मंजूरी नहीं दी जा सकती।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, हरिद्वार को छोड़कर प्रदेश की 7478 ग्राम पंचायतें, 2941 क्षेत्र पंचायतें और 341 जिला पंचायतें बिना मुखिया के रह गई हैं। राज्य के इतिहास में यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में पंचायतें एक साथ खाली हुई हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक स्तर पर चुनौतियां पैदा कर रही है, बल्कि ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर असर डाल सकती है।
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