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देहरादून की हवा हुई ज़हरीली, सूक्ष्म कण बढ़ा रहे सांस की बीमारियां

On: January 8, 2026 9:57 AM
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देहरादून में सर्दी के मौसम के साथ ही वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ गया है, जिससे आम लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है। हवा में मौजूद बेहद सूक्ष्म कण सीधे फेफड़ों तक पहुंचकर सूजन, संक्रमण और गंभीर श्वसन रोगों का कारण बन रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर अस्थमा और सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) से पीड़ित मरीजों, बच्चों और बुजुर्गों पर देखने को मिल रहा है।

डॉक्टरों के अनुसार, ठंड के दिनों में हवा में धूल, धुआं और स्मॉग की मात्रा बढ़ जाती है। ये सूक्ष्म कण सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे फेफड़ों में सूजन, फाइब्रोसिस और संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है, जिसके कारण शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है।

अस्पतालों में बढ़ी मरीजों की संख्या

दूषित हवा का असर अस्पतालों में साफ दिखाई दे रहा है। राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के क्षय एवं श्वास रोग विभाग में सामान्य दिनों में जहां ओपीडी 70 से 80 मरीजों तक रहती थी, वहीं बीते एक सप्ताह में यह संख्या बढ़कर लगभग 100 तक पहुंच गई है। निजी अस्पतालों में भी सांस से जुड़ी समस्याओं वाले मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है।

डॉक्टरों का कहना है कि इस समय सबसे अधिक अस्थमा और सीओपीडी से पीड़ित मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। कई पुराने मरीजों की दवाओं की खुराक बढ़ानी पड़ रही है, जबकि कमजोर फेफड़ों वाले कुछ मरीजों को ऑक्सीजन सपोर्ट की भी जरूरत पड़ रही है। मरीजों में सांस लेने में परेशानी, थोड़ी दूर पैदल चलने पर ही सांस फूलना और सीने में जकड़न जैसी शिकायतें आम हो गई हैं।

सर्दी में बढ़ता है कोल्ड अस्थमा का खतरा

ठंड और कोहरे के कारण कोल्ड अस्थमा के मामलों में भी वृद्धि हो रही है। यह एक ऐसी श्वसन बीमारी है, जिसमें वायुमार्ग में सूजन और संकुचन हो जाता है, जिससे सांस लेना कठिन हो जाता है। अक्सर सर्दियों के मौसम में अस्थमा के लक्षण और गंभीर हो जाते हैं।

ठंडी हवा, वायरल संक्रमण, घरों के अंदर की शुष्क हवा और बढ़ता वायु प्रदूषण अस्थमा के लक्षणों को बढ़ाने वाले प्रमुख कारण हैं। इसके चलते मरीजों को सांस लेने में दिक्कत, घरघराहट और खांसी की समस्या का सामना करना पड़ता है।

विशेषज्ञों की राय

श्रीमहंत इन्दिरेश अस्पताल के छाती एवं श्वास रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. जगदीश रावत के अनुसार,
“ठंडी हवा से श्वसन नलियां संकरी हो जाती हैं। धूल और स्मॉग फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं वायरस और बैक्टीरिया के संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। इससे इम्यून सिस्टम कमजोर होता है और खांसी, छाती में भारीपन, सांस फूलना, थकान और बार-बार सर्दी-बुखार जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। सामान्य दिनों में जहां हमारी ओपीडी 90 तक रहती थी, वह अब 140 तक पहुंच गई है।”

वहीं राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के क्षय एवं श्वास रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अनुराग अग्रवाल का कहना है कि ठंडी हवा में सांस लेने से वायुमार्ग संकुचित हो जाते हैं, जिससे अस्थमा के लक्षण उभर सकते हैं। सर्दियों में ठंडा मौसम और भीड़भाड़ वाले बंद स्थान फ्लू जैसी श्वसन बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं, जिससे अस्थमा की स्थिति और खराब हो सकती है। ऐसे में पहले से बीमार लोगों, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान

• बाहर निकलते समय नाक और मुंह को मास्क से जरूर ढकें।
• इन्फ्लूएंजा और अन्य श्वसन संक्रमण अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं, इसलिए सतर्क रहें।
• नियमित व्यायाम करें, इससे फेफड़ों की कार्यक्षमता बेहतर होती है।
• खुले में व्यायाम करने से बचें, क्योंकि प्रदूषित हवा से समस्या बढ़ सकती है।
• नाक से सांस लेने की आदत डालें, मुंह से सांस लेने से बचें, क्योंकि नाक हवा को फेफड़ों तक पहुंचने से पहले नम कर देती है।
• संक्रमण से बचाव के लिए खट्टे फल और पौष्टिक हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करें।
• घर के अंदर हल्के-फुल्के व्यायाम करें, ताकि शरीर गर्म बना रहे।
• पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, विटामिन-सी युक्त फल खाएं और बार-बार हाथ धोने की आदत डालें।

साफ है कि बदलते मौसम और बढ़ते प्रदूषण के बीच सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है। समय रहते सतर्कता बरतकर गंभीर श्वसन रोगों से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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