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Dehradun:“डिजिटल अरेस्ट” — मोबाइल-वीडियो कॉल के ज़रिये बन रहा नया जाल: तीन साल में 43 शिकार, ₹30 करोड़ से अधिक की ठगी

On: November 5, 2025 9:33 AM
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देहरादून/नई दिल्ली — डिजिटल युग में साइबर ठगों ने एक नया और खतरनाक स्कैम शुरू कर दिया है जिसे उन्होंने खुद नाम दिया है — “डिजिटल अरेस्ट”. इस चाल में ठग लोगों को वीडियो/फोन कॉल के ज़रिये यह विश्वास दिलाते हैं कि वे किसी गंभीर अपराध में पकड़े जा रहे हैं और मोटी रकम दिलवा कर पल्ला झाड़ लेते हैं। अक्टूबर 2023 से नवंबर 2025 तक दर्ज अभिलेखों के मुताबिक़ 43 लोग ऐसे स्कैम के शिकार हुए और कुल नुकसान ₹30 करोड़ से अधिक दर्ज हुआ। पीड़ितों में अधिकतर बुज़ुर्ग हैं।
क्या है “डिजिटल अरेस्ट” स्कैम — तरीका और चाल
• अपराधी पहले फोन कर बताते हैं कि पीड़ित के बैंक खाते या मोबाइल नंबर का उपयोग किसी अवैध गतिविधि में हुआ है।
• फिर डराकर यह कहा जाता है कि यदि सहयोग नहीं किया तो पुलिस गिरफ्तार कर लेगी।
• इसके बाद अपराधी वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस अधिकारी, जांच एजेंसी या किसी मंत्रालय का अधिकारी बताकर पेश करते हैं।
• वीडियो कॉल में बैकग्राउंड पर पुलिस स्टेशन, ऑफिस या सरकारी माहौल दिखाकर वास्तव को नकली तरीके से रचते हैं।
• डराने-धमकाने के बाद पीड़ित से कहा जाता है कि वह निधि ट्रांसफर करे — और रकम त्वरित रूप से विदेशों में भेज दी जाती है।
आंकड़े और कानूनी कार्रवाई
• अक्टूबर 2023 — नवंबर 2025: कुल 43 पीड़ित, कुल ठगी ₹30 करोड़+।
• गिरफ्तारियाँ: साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन द्वारा अब तक 29 आरोपियों को कब्जे में लिया गया है; शेष मामलों की भी जांच चल रही है।
• क्षेत्रवार संख्या (देहरादून साइबर क्राइम रिकॉर्ड):
• देहरादून में 24 मुक़दमे
• कुमाऊँ में 8 मुक़दमे
• उधमसिंह नगर में 6 मुक़दमे
• हरिद्वार में 4 मुक़दमे
• पौड़ी गढ़वाल में 1 मुक़दमा
• सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया है और मामले की सुनवाई कर रही है; कोर्ट ने कड़े आदेशों की ज़रूरत जताई है ताकि भविष्य में यह समस्या और गंभीर न हो।
जांच के सामने बड़ी चुनौतियाँ
• साइबर अपराधियों के दो प्रमुख ओज़ार: सिम-कार्ड और बैंक खाते। दोनों के लिए केवाईसी मौजूद है, पर कई सिम कार्ड और खाते फर्जी पहचान पर खुले पाए जा रहे हैं।
• फर्जी सिम कार्डों की बिक्री और फ़्लिपिंग (खरीद-बेच) रोकना कठिन साबित हो रहा है — हजारों सिम नकली नामों व पहचान से सक्रिय हैं।
• अपराधियों द्वारा बनाए गए फर्जी खातों में पैसे जमा कराए जाते हैं और रकम चीन, कंबोडिया, थाईलैंड जैसे देशों में ट्रांसफ़र कर दी जाती है — विदेश में बैठे ठगों की पहचान और गिरफ्तारी पुलिस के लिए कठिनाई है।
• स्थानीय पुलिस स्टेशनों के पास संसाधन और मानवशक्ति की कमी है; इससे जाल के बड़े हिस्से का भंडाफोड़ कठिन हो रहा है।
विशेषज्ञ की टिप्पणी
आईपीएस अधिकारी कुश मिश्रा ने समझाया कि “डिजिटल अरेस्ट” का मूल मक़सद पीड़ितों को ऐसा भ्रम दिखाना है कि वे किसी आपराधिक कड़ी में फँस चुके हैं और गिरफ्तार किए जा रहे हैं। वीडियो-कॉल का फर्जी पृष्ठभूमि सेटअप और अफ़सोसजनक रूप से कमजोर साइबर-साक्षरता बुज़ुर्गों को इस जाल में जल्दी फँसा देता है।
बाक़ायदा सतर्कता — कैसे बचें (ज़रूरी निर्देश)
• किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा ऑनलाइन/वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं की जाती — अगर कोई ऐसा कहे तो कॉल तुरंत काट दें।
• कभी भी OTP, बैंक खाता नंबर, कार्ड डिटेल, PAN या Aadhaar विवरण किसी को फोन/WhatsApp पर न बताएं।
• यदि कोई खुद को पुलिस, CBI, RBI या किसी सरकारी विभाग का अधिकारी बताता है तो कॉल काटकर आधिकारिक हेल्पलाइन या स्थानीय स्टेशन पर सीधे संपर्क करें।
• वीडियो कॉल पर दिखने वाला नक़ली पुलिस कार्यालय या बैकग्राउंड फ़र्ज़ी होता है — इसका मतलब विश्वास नहीं।
• संदेह होने पर राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर सम्पर्क करें और पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराएँ।
क्या किया जा रहा है और अगले कदम
सरकार व न्यायपालिका द्वारा मामलों की गंभीरता को देखते हुए कड़ी कार्रवाई और नीति-निर्माण पर बल दिया जा रहा है। पुलिस ने कुछ सफल गिरफ्तारी की हैं, पर फर्जी सिम व विदेशी लेन-देन वाली साख़ पर अंकुश लगाने के लिए तकनीकी तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत है। साथ ही सार्वजनिक जागरूकता अभियान और विशेष प्रशिक्षण से पुलिस-बल को सुदृढ़ करना भी आवश्यक है।
नोट: यदि आपको या आपके किसी परिचित को इसी तरह की कॉल मिली है, तो पहले कॉल रिकॉर्ड रीनशॉट संभाल कर रखें, तुरंत 1930 पर रिपोर्ट करें और अपने बैंक से संपर्क कर खाते की सुरक्षा सुनिश्चित कराएँ।

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