देहरादून।
उत्तराखंड की धरती के एक महान सपूत, भारतीय सेना के जांबाज अधिकारी और देश के वरिष्ठ राजनेता लेफ्टिनेंट जनरल मदन मोहन लखेड़ा (सेवानिवृत्त) का सोमवार को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। सैन्य शौर्य की प्रतिमूर्ति और मिजोरम व पुडुचेरी जैसे राज्यों के पूर्व राज्यपाल रहे ले. जनरल लखेड़ा पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे।
अस्पताल में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके महाप्रयाण की खबर मिलते ही सैन्य गलियारों, राजनीतिक हलकों और प्रशासनिक अमले सहित संपूर्ण उत्तराखंड और देश में शोक की गहरी लहर दौड़ गई है।
कल हरिद्वार में होगा अंतिम संस्कार (अंतिम यात्रा का विवरण)
पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, ले. जनरल एमएम लखेड़ा का अंतिम संस्कार मंगलवार यानी 30 जून को पवित्र नगरी हरिद्वार में पूरे राजकीय व सैन्य सम्मान के साथ किया जाएगा। उनकी पुत्री अलका कुकरेती ने इस दुखद क्षण में पिता के अंतिम सफर की जानकारी साझा की।
उन्होंने बताया कि दिवंगत जनरल साहब की अंतिम यात्रा मंगलवार सुबह ठीक 9:00 बजे उनके देहरादून स्थित निवास स्थान— ’28ए, पनाश वैली, सहस्त्रधारा रोड’ से शुरू होगी। यहाँ से उनकी पार्थिव देह को अंतिम संस्कार के लिए हरिद्वार ले जाया जाएगा, जहाँ गंगा घाट पर उन्हें मुखाग्नि दी जाएगी। इस दौरान बड़ी संख्या में सैन्य अधिकारियों, पूर्व सैनिकों और गणमान्य नागरिकों के पहुंचने की उम्मीद है।
मूल रूप से टिहरी गढ़वाल के रहने वाले थे जनरल लखेड़ा
21 अक्टूबर 1937 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत (अब उत्तराखंड) के टिहरी गढ़वाल के जाखणी (जखंद) गांव में जन्मे मदन मोहन लखेड़ा का बचपन से ही देश सेवा की तरफ झुकाव था। उनके पिता श्री जयानंद लखेड़ा क्षेत्र में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के अग्रदूत माने जाते थे।
जनरल लखेड़ा की प्रारंभिक और सैन्य शिक्षा देहरादून के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय भारतीय सैन्य कॉलेज (RIMC) से हुई। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और फिर भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) से प्रशिक्षण प्राप्त कर 8 जून 1958 को भारतीय सेना में बतौर अधिकारी कदम रखा।
सैन्य जीवन: अदम्य साहस और पदकों से सुसज्जित सफर
लेफ्टिनेंट जनरल लखेड़ा का सैन्य करियर साढ़े तीन दशकों से अधिक का रहा, जो अद्वितीय शौर्य, रणनीतिक सूझबूझ और देश के प्रति समर्पण की मिसाल है। उन्होंने देश की सीमाओं की सुरक्षा और विभिन्न संवेदनशील ऑपरेशन्स में भारतीय सेना का नेतृत्व किया।
सेना में उनके इस असाधारण और विशिष्ट योगदान के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें सेना के सर्वोच्च और अत्यंत प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था:
- परम विशिष्ट सेवा मेडल (PVSM): सैन्य सेवा में सबसे उच्च स्तर के असाधारण कार्य के लिए।
- अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM): कर्तव्य के प्रति अद्वितीय निष्ठा और उत्कृष्ट सेवा के लिए।
- विशिष्ट सेवा मेडल (VSM): उच्च स्तर की सराहनीय और विशिष्ट सेवा के लिए।
राज्यपाल के रूप में अद्वितीय कार्यकाल: जब अफसरशाही को सिखाया जनता का सम्मान
सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी जनरल लखेड़ा ने आराम करने के बजाय देश और समाज की सेवा का मार्ग चुना। उनकी बेदाग छवि, अनुशासन और प्रशासनिक कौशल को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें देश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर नियुक्त किया।
वह पुडुचेरी के उपराज्यपाल (2004-2006) रहे और इस दौरान उनके पास अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का भी अतिरिक्त प्रभार रहा। इसके बाद, उन्होंने मिजोरम के 8वें राज्यपाल (2006-2011) के रूप में एक लंबा और ऐतिहासिक कार्यकाल पूरा किया।
एक मिसाल जो इतिहास बन गई:
पुडुचेरी के उपराज्यपाल रहते हुए जनरल लखेड़ा ने सरकारी तंत्र और अफसरशाही के काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया था। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में आम जनता को हर काम के लिए सबसे पहले ‘ना’ या ‘नहीं’ सुनने को मिलता है। जनरल लखेड़ा ने सत्ता संभालते ही इस ढर्रे पर चोट की।
उन्होंने एक कड़ा आदेश जारी कर अफसरों से कहा था कि— “जनता को सीधे ‘ना’ नहीं कहा जाएगा। यदि किसी काम के लिए मना किया जा रहा है, तो फाइल पर उसका स्पष्ट और तार्किक कारण लिखना होगा कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता।” उनके इस एक फैसले ने सुशासन और पारदर्शिता की नई इबारत लिखी।
सहज व्यवहार और सादगी से जीता सबका दिल
एक सख्त सैन्य कमांडर और उच्च संवैधानिक पद पर रहने के बावजूद जनरल लखेड़ा स्वभाव से बेहद सौम्य, सादगी पसंद और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। मिजोरम के राज्यपाल के तौर पर उन्होंने वहां की संस्कृति और भाषा को बढ़ावा देने के लिए भी काफी काम किया। पूर्वोत्तर राज्यों में आज भी उन्हें एक लोक-प्रिय और जन-सरोकारों से जुड़े राज्यपाल के रूप में याद किया जाता है।
ये भी पढ़े➜देहरादून के निजी कॉलेज में तिलक और कलावा उतरवाने पर भारी बवाल, बजरंग दल ने किया जोरदार हंगामा
उत्तराखंड और देश के लिए एक अपूर्णीय क्षति
उनके निधन की सूचना मिलते ही पूर्व सैनिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, उत्तराखंड के प्रमुख राजनेताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने गहरी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। सभी ने एक सुर में कहा कि जनरल लखेड़ा का जाना न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक ऐसी क्षति है जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक कुशल प्रशासक, देशभक्त और प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में जीवंत रहेंगे।







