नई दिल्ली/जामनगर
वैश्विक प्रतिबंधों और कड़े भू-राजनीतिक दबावों को दरकिनार करते हुए भारत ने रूस के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को और मजबूत कर लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस से तेल न खरीदने की लगातार दी जा रही सलाह और दबाव का भारतीय रुख पर कोई असर नहीं पड़ा है। हाल ही में जारी एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने मई महीने में रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल (Crude Oil) की खरीद में 21 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया है। इस बड़ी तेल डील के बाद भारत, चीन के बाद रूसी ईंधन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बनकर उभरा है।
유럽 के थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ (CREA) द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, मई में भारत ने रूस से कुल 5.8 अरब यूरो (लगभग 6.7 अरब डॉलर) मूल्य के जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) का आयात किया। इस रणनीतिक कदम से भारत के कुल कच्चे तेल के आयात में पिछले महीने के मुकाबले 8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण रूसी आयात में आई बड़ी तेजी है।
निजी और सरकारी रिफाइनरी हब्स में रिकॉर्ड आवक
रूस से आने वाले कच्चे तेल की इस खेप को भारत के प्रमुख निजी और सरकारी तेल शोधन केंद्रों (Refining Hubs) में बड़े पैमाने पर अनलोड किया गया। आंकड़ों के अनुसार, गुजरात के जामनगर और वाडिनार जैसे विशाल रिफाइनिंग हब्स में रूसी तेल की आवक में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई:
- वाडिनार रिफाइनरी (गुजरात): अप्रैल महीने की तुलना में मई में यहाँ रूसी कच्चे तेल की अनलोडिंग में 36 प्रतिशत का बड़ा उछाल आया।
- जामनगर रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स (रिलायंस): इस दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स में रूसी तेल की डिलीवरी में 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सरकारी तेल कंपनियों की भी दमदार वापसी
शुरुआती हिचकिचाहट के बाद, भारत की सरकारी रिफाइनरियों ने भी इस साल रूसी तेल की खरीद को आक्रामक तरीके से बढ़ाया है।
- न्यू मैंगलोर और विशाखापत्तनम रिफाइनरियों ने नवंबर 2025 के अंत में कुछ समय के लिए रूसी आयात को रोक दिया था, लेकिन मार्च से इसे दोबारा शुरू किया गया। मई में न्यू मैंगलोर में रूसी तेल की डिलीवरी महीने-दर-महीने 13 प्रतिशत बढ़ी, जबकि विशाखापत्तनम में इसमें 42 प्रतिशत की भारी उछाल आई।
- ओडिशा के पूर्वी तट पर स्थित पारादीप रिफाइनरी ने भी पिछले दो वर्षों में रूसी कच्चे तेल की अपनी अब तक की सबसे बड़ी खेप को अनलोड किया।
रूस के तेल निर्यात की वैश्विक तस्वीर: कौन कहाँ खड़ा है?
यूक्रेन संकट के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार के प्रवाह को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में रूस के कुल कच्चे तेल के निर्यात का एक बड़ा हिस्सा एशियाई महाद्वीप में आ रहा है। मई के वैश्विक आंकड़ों के अनुसार:
खरीदार देश
रूसी कच्चे तेल के निर्यात में हिस्सेदारी
चीन
50%
भारत
36%
तुर्की
6%
यूरोपीय संघ (EU)
5%
रूस से होने वाले कुल भारतीय आयात में अकेले कच्चे तेल की हिस्सेदारी 83 प्रतिशत (4.8 अरब यूरो) रही। इसके अलावा भारत ने 550 मिलियन यूरो के तेल उत्पाद और 429 मिलियन यूरो मूल्य के कोयले का भी आयात किया।
चीन बना हुआ है सबसे बड़ा खरीदार
मई 2026 में चीन वैश्विक स्तर पर रूसी ईंधन का सबसे बड़ा आयातक बना रहा। रूस को शीर्ष पांच खरीदार देशों से होने वाली कुल कमाई में अकेले चीन का योगदान 38% (7.0 बिलियन यूरो) था। चीन के कुल आयात का खाका इस प्रकार है:
- कच्चा तेल: 4.8 बिलियन यूरो (लगभग 69%)
- पाइपलाइन गैस: 618 मिलियन यूरो
- कोयला: 525 million यूरो
- एलएनजी (LNG): 510 मिलियन यूरो
- अन्य पेट्रोलियम उत्पाद: 479 मिलियन यूरो
पश्चिमी देशों का दोहरा मापदंड: प्रतिबंधों के बीच भी खरीदा रूसी तेल
CREA की रिपोर्ट में एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जनवरी 2026 में यूरोपीय संघ (EU) द्वारा रूसी कच्चे तेल से बने रिफाइंड उत्पादों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के बावजूद, मई 2026 में रूसी तेल का इस्तेमाल करने वाली रिफाइनरियों से 10 बड़े तेल टैंकर (जहाज) सीधे EU के बंदरगाहों पर पहुंचे।
वास्तव में, भारत, तुर्की, ब्रुनेई और जॉर्जिया जैसे देशों ने रूसी कच्चे तेल को रिफाइन करके प्रतिबंध लगाने वाले पश्चिमी देशों को ही 641 मिलियन यूरो के पेट्रोलियम उत्पाद बेचे। इसमें से लगभग 214 मिलियन यूरो के उत्पाद पूरी तरह से रूसी कच्चे तेल से ही तैयार किए गए थे।
प्रतिबंध लगाने वाले प्रमुख खरीदार देश:
- ऑस्ट्रेलिया: 275 मिलियन यूरो
- यूरोपीय संघ (EU): 174 मिलियन यूरो
- अमेरिका: 147 मिलियन यूरो
- न्यूजीलैंड: 45 मिलियन यूरो
अमेरिका को किया गया यह निर्यात मुख्य रूप से भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) की जामनगर रिफाइनरी और तुर्की की स्टार व तुप्रास इजमित रिफाइनरियों के जरिए हुआ। पिछले तीन महीनों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि तुर्की की स्टार रिफाइनरी ने अपने कुल कच्चे तेल का 39% और भारत की जामनगर रिफाइनरी ने 15% हिस्सा सीधे रूस से आयात किया था।
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह डील?
वैश्विक मंच पर भू-राजनीतिक समीकरण जो भी हों, भारत ने हमेशा ‘नेशन फर्स्ट’ (राष्ट्र प्रथम) की नीति अपनाई है। रूस से मिल रहे रियायती तेल की बदौलत भारतीय रिफाइनरियों को वैश्विक बाजार में महंगी तेल कीमतों की भरपाई करने में बड़ी मदद मिली है। इससे न केवल देश के भीतर ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिल रही है, बल्कि भारतीय रिफाइनरियों का ‘रिफाइनिंग मार्जिन’ भी मजबूत हुआ है, जिससे वे पश्चिमी देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का बड़े पैमाने पर निर्यात कर मुनाफा कमा रही हैं।










