जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान के दौरान उत्तराखंड के कपकोट क्षेत्र के बीथी गांव निवासी हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका पार्थिव शरीर मंगलवार को उनके पैतृक क्षेत्र कपकोट लाया जाएगा। शहादत की खबर से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है, वहीं लोगों को अपने वीर जवान पर गर्व भी है।
43 वर्षीय गजेंद्र सिंह गढ़िया भारतीय सेना की टू-पैरा कमांडो यूनिट में तैनात थे। वह किश्तवाड़ में आतंकियों की तलाश के लिए चलाए जा रहे संयुक्त अभियान ‘ऑपरेशन त्राशी’ का हिस्सा थे। रविवार को छात्रू क्षेत्र के सुदूर सिंहपोरा इलाके में सर्च ऑपरेशन के दौरान आतंकियों ने सुरक्षा बलों पर ग्रेनेड से हमला कर दिया। इस हमले में हवलदार गजेंद्र सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए।
शहीद जवान अपने पीछे पिता धन सिंह गढ़िया, माता चंद्रा देवी गढ़िया, पत्नी लीला गढ़िया, दो पुत्र राहुल और धीरज तथा छोटे भाई किशोर गढ़िया को छोड़ गए हैं। परिजनों के अनुसार, शहीद का पार्थिव शरीर हेलीकॉप्टर के माध्यम से मंगलवार को केदारेश्वर मैदान लाया जाएगा। इसके बाद सरयू और खीरगंगा नदियों के संगम पर पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
शहादत की खबर मिलते ही गांव में उमड़ा जनसैलाब
शहीद गजेंद्र सिंह के दोनों बच्चे देहरादून में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। उनका एक पुत्र छह वर्ष का है, जबकि दूसरा कक्षा चार का छात्र है। शहादत की सूचना मिलते ही पत्नी लीला गढ़िया गांव पहुंचीं। परिजनों के अनुसार, खबर सुनने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। परिचित विनीता जोशी उन्हें लेकर हेलीकॉप्टर से गरुड़ के मेलाडुंगरी हेलीपैड तक पहुंचीं। वहां से व्हीलचेयर की सहायता से उन्हें वाहन तक लाया गया और फिर कपकोट लाया गया।
सेना के निर्देश पर सूबेदार मोहन चंद्र भी कपकोट पहुंचे। जवान के बलिदान की सूचना मिलते ही उनके घर पर सांत्वना देने वालों का तांता लग गया। पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल है और लोग नम आंखों से अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि दे रहे हैं।
2004 में हुए थे सेना में भर्ती
गजेंद्र सिंह गढ़िया ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय से प्राप्त की। कक्षा छह से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज कपकोट से पूरी की। स्नातक प्रथम वर्ष की पढ़ाई के दौरान वर्ष 2004 में उन्होंने भारतीय सेना में भर्ती होकर देश सेवा का संकल्प लिया। आज उनका बलिदान पूरे क्षेत्र के लिए गर्व और प्रेरणा का स्रोत बन गया है।







