उत्तराखंड के 250 किलोमीटर लंबे भूभाग में जमीन के सिकुड़ने की प्रक्रिया जारी है, जिससे धरती के भीतर भूकंपीय ऊर्जा तेजी से जमा हो रही है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह क्षेत्र अब एक ‘लॉकिंग ज़ोन’ बन चुका है, जहां से ऊर्जा बाहर नहीं निकल पा रही है। यह स्थिति किसी भी समय 7 से 8 रिक्टर स्केल तक के शक्तिशाली भूकंप को जन्म दे सकती है।
संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के मुताबिक, हिमालय की सामान्य खिसकने की गति 40 मिलीमीटर प्रतिवर्ष होती है, लेकिन कुमाऊं के टनकपुर से देहरादून तक यह गति घटकर 14-20 मिलीमीटर हो गई है। GPS सर्वेक्षणों से मिली जानकारी से स्पष्ट है कि यह क्षेत्र भूगर्भीय तनाव से जूझ रहा है और भविष्य में विनाशकारी कंपन की संभावना बढ़ गई है।
वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डॉ. आरजे पेरुमल ने यह भी बताया कि मुनस्यारी से देहरादून के मोहंड तक लगभग 80 किलोमीटर की ज़मीन 20 मिमी/वर्ष की दर से खिसक रही है। यहां मौजूद चार प्रमुख फाल्ट्स 10-15 किलोमीटर की गहराई तक फैले हैं और अत्यधिक ढाल के कारण ऊर्जा का बाहर निकलना संभव नहीं हो पा रहा। यही ‘लॉकिंग ज़ोन’ बड़े भूकंप की प्रमुख वजह बन सकता है।
ऐसा खतरा पहले नेपाल में भी देखा जा चुका है, जहां 1934 और 2015 में भयानक भूकंप आए थे। उत्तराखंड में भी ऐतिहासिक रूप से 1334, 1505 और 1803 में शक्तिशाली भूकंप आ चुके हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतने वर्षों में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, जिससे साफ है कि धरती के भीतर ऊर्जा का दबाव लगातार बढ़ रहा है — जो कभी भी टूट सकता है।
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