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आस्था का सैलाब: देहरादून में ऐतिहासिक झंडा मेला शुरू, 94 फीट ऊंचे झंडे जी के आरोहण से गुंजायमान हुआ दरबार साहिब

On: March 9, 2026 2:35 AM
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"देहरादून झंडा मेला दरबार साहिब में झंडे जी का आरोहण और श्रद्धालुओं की भारी भीड़।"

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में रविवार को अटूट श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक ‘ऐतिहासिक झंडा मेला’ पूरी भव्यता के साथ शुरू हो गया। श्री गुरु राम राय दरबार साहिब परिसर में जैसे ही 94 फीट ऊंचे पवित्र झंडे जी (ध्वज स्तंभ) का आरोहण हुआ, पूरा वातावरण गुरु महाराज के जयकारों से गूंज उठा। इस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बनने के लिए देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु (संगतें) दरबार साहिब पहुंचे।
भक्ति और उल्लास का संगम
रविवार दोपहर ठीक 4 बजकर 12 मिनट पर दरबार साहिब के सज्जादानशीन श्रीमहंत देवेन्द्र दास महाराज के दिशा-निर्देशन और देखरेख में नए ध्वज दंड का आरोहण संपन्न हुआ। झंडे जी को ऊपर उठाने की प्रक्रिया शुरू होते ही श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर था। ढोल-नगाड़ों की थाप और ‘धन-धन श्री गुरु राम राय’ के उद्घोष के बीच जब झंडे जी ने आकाश छुआ, तो कई श्रद्धालुओं की आंखें भक्ति भाव से नम हो गईं।
इस अवसर पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़ और राजस्थान समेत विदेशों से भी भारी संख्या में संगतें यहां पहुंची हैं। झंडे जी के आरोहण के बाद श्रद्धालुओं ने पवित्र ध्वज दंड को स्पर्श कर सुख-समृद्धि की कामना की।
नगर परिक्रमा की तैयारियां पूरी
मेले के उपलक्ष्य में आगामी मंगलवार को भव्य ‘नगर परिक्रमा’ का आयोजन किया जाएगा। श्रीमहंत देवेन्द्र दास महाराज की अगुआई में निकलने वाली इस परिक्रमा के लिए श्री दरबार साहिब और मेला आयोजन समिति ने सुरक्षा और व्यवस्था के कड़े इंतजाम किए हैं। नगर परिक्रमा के दौरान पूरी दून घाटी गुरु भक्ति के रंग में सराबोर नजर आएगी।
झंडा मेले का महत्व और इतिहास: क्यों मनाया जाता है यह उत्सव?
देहरादून के अस्तित्व और पहचान से जुड़ा यह झंडा मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है। आइए जानते हैं इसके पीछे का इतिहास और धार्मिक महत्व:

  1. श्री गुरु राम राय महाराज का आगमन
    यह मेला सिखों के सातवें गुरु, श्री गुरु हर राय जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री गुरु राम राय जी के देहरादून आगमन की स्मृति में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु महाराज वर्ष 1676 में चैत्र मास की पंचमी तिथि (होली के पांचवें दिन) को देहरादून आए थे। उन्होंने यहां अपना ‘डेरा’ डाला था, जिससे इस शहर का नाम ‘डेरा-दून’ और कालांतर में ‘देहरादून’ पड़ा।
  2. क्यों फहराया जाता है झंडा जी?
    झंडे जी का आरोहण गुरु महाराज के सम्मान और उनकी आध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक के रूप में किया जाता है। 94 फीट ऊंचा यह ध्वज दंड एकता, शांति और मानवता का संदेश देता है। मेले की शुरुआत ‘गिलाफ’ (पवित्र वस्त्र) चढ़ाने की परंपरा से होती है। इस ध्वज दंड पर मखमल और सूती कपड़े के कई आवरण चढ़ाए जाते हैं, जिन्हें ‘गिलाफ’ कहा जाता है। सबसे बाहरी गिलाफ को ‘दर्शनी गिलाफ’ कहते हैं, जिसे चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं को कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।
  3. सौहार्द और सेवा की मिसाल
    झंडा मेला सांप्रदायिक सौहार्द का भी प्रतीक है। यहाँ हर धर्म और जाति के लोग आकर मत्था टेकते हैं। मेले के दौरान ‘लंगर’ (सामुदायिक रसोई) की व्यवस्था की जाती है, जहाँ हजारों लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं। यह गुरु महाराज की उस सीख को जीवंत करता है जिसमें उन्होंने ‘मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है’ का संदेश दिया था।
  4. मनोकामना पूर्ति का विश्वास
    श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि झंडे जी के दर्शन करने और वहां मन्नत का गिलाफ चढ़ाने से हर मुराद पूरी होती है। यही कारण है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इस मेले का हिस्सा बनने दूर-दूर से देहरादून खिंचे चले आते हैं।

विशेष नोट: प्रशासन ने मेले में भारी भीड़ को देखते हुए यातायात रूट में बदलाव किया है और सुरक्षा के लिए चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात किया गया है।

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