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Uttarakhand Political History: 26 साल में 12 मुख्यमंत्री, सत्ता परिवर्तन से स्थिर नेतृत्व तक की पूरी कहानी

On: July 6, 2026 4:46 PM
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Uttarakhand Political History

Uttarakhand Political History केवल मुख्यमंत्रियों की सूची नहीं, बल्कि राजनीतिक उतार-चढ़ाव, नेतृत्व परिवर्तन, चुनावी रणनीतियों, संगठनात्मक फैसलों और ऐतिहासिक घटनाओं की ऐसी कहानी है जिसने राज्य की दिशा तय की। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड ने अब तक 12 मुख्यमंत्री देखे हैं। इस दौरान कई सरकारें बनीं, बदलीं और कई ऐसे फैसले हुए जिन्होंने राज्य की राजनीति को नई पहचान दी।

आज जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाने की ओर बढ़ रहे हैं, तब Uttarakhand Political History को समझना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

राज्य गठन के बाद पहला नेतृत्व और शुरुआती राजनीतिक संघर्ष

9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया। नए राज्य के सामने प्रशासनिक ढांचा तैयार करने से लेकर विकास की प्राथमिकताएं तय करने जैसी कई बड़ी चुनौतियां थीं। भाजपा ने वरिष्ठ नेता नित्यानंद स्वामी को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनाया।

हालांकि, राज्य आंदोलन से जुड़े कई नेताओं और कार्यकर्ताओं का मानना था कि आंदोलन से निकले किसी चेहरे को यह जिम्मेदारी मिलनी चाहिए थी। संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष के बाद लगभग एक वर्ष में नेतृत्व बदल दिया गया और भगत सिंह कोश्यारी मुख्यमंत्री बने।

पहले चुनाव में कांग्रेस की वापसी और एनडी तिवारी का दौर

2002 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई और अनुभवी नेता नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। उस समय हरीश रावत भी मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता दी।

Uttarakhand Political History में एनडी तिवारी का कार्यकाल औद्योगिक विकास के लिए याद किया जाता है। सिडकुल परियोजनाएं, निवेश और औद्योगिक विस्तार ने राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। इसी दौरान सरकार और संगठन के बीच अलग-अलग शक्ति केंद्र भी चर्चा का विषय बने।

भाजपा की वापसी और लगातार बदलते मुख्यमंत्री

2007 में भाजपा सत्ता में लौटी और पूर्व सेना अधिकारी मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी मुख्यमंत्री बने। उनकी पहचान ईमानदार और अनुशासित नेता की रही। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद संगठन ने नेतृत्व परिवर्तन करते हुए रमेश पोखरियाल निशंक को मुख्यमंत्री बनाया।

निशंक सरकार के दौरान कई प्रशासनिक फैसलों और विवादों को लेकर विपक्ष सक्रिय रहा। चुनाव नजदीक आने पर भाजपा ने एक बार फिर खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया और “खंडूड़ी है जरूरी” का नारा भी दिया, लेकिन पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर सकी।

केदारनाथ आपदा और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति

2012 में कांग्रेस सत्ता में लौटी और विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2013 की केदारनाथ आपदा ने पूरे राजनीतिक समीकरण बदल दिए। राहत एवं बचाव कार्यों को लेकर सरकार की आलोचना हुई और पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की मांग तेज हो गई।

आखिरकार 2014 में हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि उनका कार्यकाल भी राजनीतिक संकटों से भरा रहा। 2016 में कांग्रेस के कई विधायकों की बगावत के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हुआ और मामला अदालत तक पहुंचा। फ्लोर टेस्ट के बाद हरीश रावत दोबारा मुख्यमंत्री बने, लेकिन 2017 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

त्रिवेंद्र से तीरथ तक और फिर धामी का उदय

2017 में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करने जैसे महत्वपूर्ण फैसले हुए। लेकिन संगठन और विधायकों की नाराजगी के बीच 2021 में नेतृत्व बदल दिया गया।

तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बने, लेकिन संवैधानिक कारणों और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते लगभग चार महीने बाद ही उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद जुलाई 2021 में भाजपा ने युवा नेता पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया।

धामी सरकार ने बदली Uttarakhand Political History की दिशा

जब पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बने, तब इसे चुनावी प्रयोग माना गया था। लेकिन अगले कुछ वर्षों में उन्होंने खुद को राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थापित किया।

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटी। हालांकि धामी अपनी खटीमा सीट हार गए, लेकिन पार्टी ने उन पर भरोसा बनाए रखा और दोबारा मुख्यमंत्री बनाया। बाद में उन्होंने चंपावत उपचुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की।

धामी सरकार ने समान नागरिक संहिता (UCC), सख्त नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, निवेश सम्मेलन, सशक्त भू-कानून और प्रशासनिक सुधार जैसे कई फैसलों को लागू किया। इन फैसलों ने Uttarakhand Political History में उनकी अलग पहचान बनाई।

बार-बार बदलते नेतृत्व से स्थिर सरकार तक का सफर

उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय तक नेतृत्व परिवर्तन के लिए जानी जाती रही। कभी चुनावी हार, कभी संगठन की नाराजगी, कभी आपदा तो कभी संवैधानिक परिस्थितियों ने मुख्यमंत्री बदलने की परंपरा बना दी थी।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक स्थिरता दिखाई देने लगी है। लगातार दूसरे कार्यकाल में सरकार चलाने वाले पुष्कर सिंह धामी राज्य के पहले ऐसे नेता बनने की ओर बढ़ रहे हैं, जो सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहेंगे।

उत्तराखंड की राजनीति का नया अध्याय

Uttarakhand Political History बताती है कि पिछले 26 वर्षों में राज्य ने राजनीतिक अस्थिरता, नेतृत्व परिवर्तन, संगठनात्मक संघर्ष, चुनावी चुनौतियां और बड़े प्रशासनिक फैसले देखे हैं। नित्यानंद स्वामी से लेकर पुष्कर सिंह धामी तक का सफर केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के लोकतांत्रिक विकास का दस्तावेज भी है।

आज राज्य ऐसी स्थिति में पहुंचता दिखाई दे रहा है जहां बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती नजर आ रही है। यदि वर्तमान राजनीतिक स्थिरता आगे भी बनी रहती है, तो आने वाले वर्षों में Uttarakhand Political History को स्थायी नेतृत्व और दीर्घकालिक विकास मॉडल के रूप में भी याद किया जा सकता है।

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