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उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का नया अध्याय: 9 जिलों में स्थापित होंगे AWS, 3 में लगेंगे हाई-टेक डॉप्लर राडार

On: February 21, 2026 3:54 PM
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देहरादून: हिमालयी राज्य उत्तराखंड, जो अपनी भौगोलिक संवेदनशीलता के कारण अक्सर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है, अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने राज्य में ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (Early Warning System) को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत राज्य के नौ जिलों में ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन (AWS) और तीन प्रमुख जिलों में डॉप्लर राडार स्थापित किए जाएंगे।
तकनीक से लैस होगा आपदा तंत्र
आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, राज्य सरकार का मुख्य उद्देश्य आपदा आने से पहले सटीक जानकारी जुटाना है ताकि जन-धन की हानि को न्यूनतम किया जा सके। रक्षा भू-स्थानिक अनुसंधान प्रतिष्ठान (DGRE) के तकनीकी सहयोग से राज्य के विभिन्न जिलों में 35 से अधिक एडब्ल्यूएस (AWS) स्थापित किए जाने की योजना है।
जिलों के अनुसार AWS का वितरण:
* उत्तरकाशी व टिहरी: 8-8 स्टेशन
* पौड़ी गढ़वाल: 7 स्टेशन
* देहरादून: 5 स्टेशन
* रुद्रप्रयाग व बागेश्वर: 3-3 स्टेशन
* अल्मोड़ा: 2 स्टेशन
* नैनीताल व हरिद्वार: 1-1 स्टेशन
इन स्टेशनों के सक्रिय होने से मौसम की सूक्ष्म जानकारी, जैसे तापमान में बदलाव, हवा की गति और आर्द्रता का सटीक डेटा रियल टाइम में मिल सकेगा।
डॉप्लर राडार: बादलों की गतिविधियों पर पैनी नजर
राज्य में बादलों के फटने और अचानक होने वाली भारी वर्षा की सटीक भविष्यवाणी के लिए तीन नए डॉप्लर राडार लगाए जाएंगे। मौसम विभाग ने इसके लिए देहरादून, अल्मोड़ा, चंपावत और चमोली का चयन किया है, जिनमें से किन्हीं तीन जिलों में भूमि चयन के बाद इन्हें स्थापित किया जाएगा। डॉप्लर राडार न केवल वर्षा की मात्रा बल्कि बादलों के घनत्व और उनकी दिशा पर भी लाइव नजर रखने में सक्षम होंगे।
संचार व्यवस्था के लिए DDRN का कवच
आपदा के समय अक्सर मोबाइल टावर और इंटरनेट सेवाएं ठप हो जाती हैं, जिससे राहत कार्य बाधित होता है। इस समस्या के समाधान के लिए रुद्रप्रयाग जिले की तर्ज पर अब राज्य के सभी जिलों में डीडीआरएन (डिजास्टर डेडिकेटेड रेडियो नेटवर्क) स्थापित किया जाएगा।
> क्या है DDRN?
> यह एक उच्च क्षमता वाला रेडियो नेटवर्क है जो सामान्य मोबाइल नेटवर्क फेल होने पर भी निर्बाध रूप से काम करता है। इसमें वॉयस कॉल के साथ-साथ हाई-स्पीड इंटरनेट और वीडियो कम्युनिकेशन की सुविधा भी उपलब्ध होती है, जिससे प्रशासन और राहत एजेंसियों के बीच संवाद बना रहता है।
>
तहसील स्तर पर भी बनेंगे ‘कंट्रोल रूम’
सरकार ने आपदा प्रबंधन की कमान को निचले स्तर तक मजबूत करने का निर्णय लिया है। अभी तक केवल राज्य और जिला स्तर पर ही आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC/DEOC) सक्रिय थे, लेकिन अब तहसीलों में भी परिचालन केंद्र बनाए जाएंगे। सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि तहसीलों को जरूरी उपकरणों और संसाधनों से लैस किया जाएगा ताकि स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया (Quick Response) सुनिश्चित हो सके।
संसाधनों की GIS मैपिंग और जवाबदेही
पारदर्शिता और कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए राज्य के पास उपलब्ध हर आपदा राहत उपकरण की जीआईएस (GIS) मैपिंग की जा रही है। आईडीआरएन (IDRN) पोर्टल पर सभी जिलों को अपने उपकरणों का विवरण अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। मानसून से पहले इस कार्य को पूर्ण करने का लक्ष्य रखा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में यह पता रहे कि निकटतम मशीनरी कहाँ उपलब्ध है।
इसके अतिरिक्त, बैठक में वर्ष 2025 की आपदाओं में जान गंवाने वाले नेपाली मूल के व्यक्तियों के परिजनों को आर्थिक सहायता और मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित मामलों का निस्तारण कराया जा सके।
निष्कर्ष: उत्तराखंड सरकार का यह “तकनीक आधारित आपदा प्रबंधन” मॉडल न केवल राज्य के निवासियों के लिए सुरक्षा कवच बनेगा, बल्कि चारधाम यात्रा और पर्यटन के लिए आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के भरोसे को भी मजबूत करेगा।

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