नई दिल्ली | भारतीय शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड्स को नियंत्रित करने वाली संस्था भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने निवेशकों के हित में अब तक के सबसे बड़े सुधारों में से एक की घोषणा की है। सेबी ने म्यूचुअल फंड नियमों में आमूल-चूल बदलाव करते हुए पुरानी ‘सॉल्यूशन ओरिएंटेड स्कीम्स’ को बंद करने का निर्णय लिया है। इसकी जगह अब ‘लाइफ साइकिल फंड’ (Life Cycle Funds) की एक नई कैटेगरी निवेश बाजार में दस्तक देगी।
सेबी के इस कदम का मुख्य उद्देश्य निवेशकों को अधिक पारदर्शिता प्रदान करना और उनके वित्तीय लक्ष्यों को जोखिम-मुक्त तरीके से पूरा करना है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इन बदलावों का आपके पोर्टफोलियो पर क्या असर पड़ेगा।
रिटायरमेंट और चिल्ड्रन फंड्स का सफर खत्म, अब आएगी नई व्यवस्था
अब तक म्यूचुअल फंड बाजार में विशेष लक्ष्यों (जैसे बच्चों की पढ़ाई या बुढ़ापे के लिए फंड) के लिए ‘सॉल्यूशन ओरिएंटेड स्कीम्स’ उपलब्ध थीं। लेकिन सेबी ने अब इस पूरी श्रेणी को ही समाप्त करने का मन बना लिया है।
मुख्य आंकड़े:
- कुल प्रभावित स्कीम्स: 41
- कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM): लगभग ₹57,274 करोड़
- विभाजन: इस कैटेगरी में वर्तमान में 29 रिटायरमेंट फंड और 12 चिल्ड्रन फंड्स संचालित हैं।
इन सभी फंड्स को अब नए ‘लाइफ साइकिल फंड’ के ढांचे में ढाला जाएगा।
क्या हैं ‘लाइफ साइकिल फंड’? कैसे करेंगे काम?
सेबी द्वारा पेश किए गए नए लाइफ साइकिल फंड असल में ‘टार्गेट डेट फंड’ (Target Date Funds) के सिद्धांत पर काम करेंगे। यह उन निवेशकों के लिए गेम-चेंजर साबित होंगे जो लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए निवेश करते हैं। - ऑटोमैटिक रिस्क मैनेजमेंट: शुरुआत में जब निवेशक युवा होता है, तो फंड का अधिकतम हिस्सा इक्विटी (शेयर बाजार) में लगाया जाएगा ताकि अधिक रिटर्न मिल सके।
- उम्र के साथ बदलाव: जैसे-जैसे निवेशक अपने लक्ष्य (रिटायरमेंट या बच्चे की उच्च शिक्षा) के करीब पहुँचेगा, फंड का निवेश धीरे-धीरे सुरक्षित डेट फंड (Fixed Income) की तरफ शिफ्ट कर दिया जाएगा।
- सुरक्षा और स्पष्टता: इससे मैच्योरिटी के समय बाजार की अस्थिरता का खतरा कम हो जाता है, जिससे निवेशक की जमा पूंजी सुरक्षित रहती है।
फंड ऑफ फंड्स (FoF) के लिए भी कड़े हुए नियम
सेबी ने केवल कैटेगरी ही नहीं बदली, बल्कि फंड ऑफ फंड्स (FoF) के संचालन के तरीके को भी सख्त कर दिया है। FoF वे स्कीम्स होती हैं जो सीधे शेयरों में निवेश न करके दूसरे म्यूचुअल फंड्स में पैसा लगाती हैं। - 95% निवेश का नियम: अब फंड हाउसों को अपनी कुल पूंजी का कम से कम 95% हिस्सा ‘अंडरलाइंग फंड’ (मुख्य फंड जिसमें निवेश किया जाना है) में डालना अनिवार्य होगा।
- लॉन्चिंग की सीमा: अब एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMC) अनगिनत FoF लॉन्च नहीं कर पाएंगी। सेबी अब इनकी संख्या पर एक निश्चित सीमा तय करेगा ताकि बाजार में भ्रम की स्थिति न रहे।
निवेशकों को क्या मिलेगा? पारदर्शिता और स्पष्टता
सेबी के इस सर्कुलर का सबसे बड़ा फायदा आम निवेशकों को क्लैरिटी (Clarity) के रूप में मिलेगा। इसके दो प्रमुख बिंदु हैं: - पोर्टफोलियो ओवरलैप की जानकारी: अब फंड मैनेजरों को यह बताना अनिवार्य होगा कि उनके पोर्टफोलियो में स्टॉक्स का कितना दोहराव (Overlap) है। इससे निवेशक यह समझ पाएंगे कि क्या उनका पैसा बार-बार एक ही कंपनी में तो नहीं लग रहा।
- नाम में समानता: अब म्यूचुअल फंड स्कीम का नाम उसकी कैटेगरी के अनुसार ही होना चाहिए। इससे मार्केटिंग के नाम पर होने वाले भ्रम को रोका जा सकेगा।
कब से लागू होंगे ये नियम?
सेबी ने स्पष्ट किया है कि म्यूचुअल फंड हाउसों को इन बदलावों को अपनाने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है। यानी अगले आधे साल के भीतर सभी एसेट मैनेजमेंट कंपनियों को अपनी पुरानी स्कीम्स को नई कैटेगरी में बदलना होगा और पोर्टफोलियो डिस्क्लोजर के नए नियमों का पालन करना होगा।
विशेषज्ञ की राय: बाजार जानकारों का मानना है कि ‘लाइफ साइकिल फंड’ आने से भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग का तरीका बदल जाएगा। यह उन लोगों के लिए बेहतरीन है जो खुद से पोर्टफोलियो को री-बैलेंस नहीं कर पाते।










