देहरादून। ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है जहां उम्मीदें टूट जाती हैं और खुशियां मातम में बदल जाती हैं। एक ऐसा ही हृदयविदारक दृश्य देखने को मिला जब हवलदार दिनेश चंद्र ममगाईं, जो रिटायरमेंट की तैयारी कर रहे थे, ड्यूटी के दौरान अचानक इस दुनिया को अलविदा कह गए। सेवानिवृत्ति से ठीक कुछ घंटे पहले उनके निधन की खबर से परिवार में कोहराम मच गया।
हवलदार दिनेश चंद्र ने 24 वर्षों तक नागा रेजीमेंट की दूसरी बटालियन में सेवा दी थी। इसके बाद भी उन्होंने देश सेवा का संकल्प जारी रखते हुए डिफेंस सिक्योरिटी कोर (DSC) में दोबारा भर्ती ली थी। वर्तमान में उनकी तैनाती उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के सरसावा में थी, जहां एक जून को उन्हें अंतिम बार वर्दी पहननी थी। इसी दिन उनका रिटायरमेंट तय था, लेकिन नियति ने इससे पहले ही उनकी जीवन यात्रा को विराम दे दिया।
सज रहा था घर, लेकिन पहुंचा तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर
परिजनों के अनुसार एक जून को घर में रिटायरमेंट की खुशी मनाने की तैयारी चल रही थी। रिश्तेदारों को बुलाया गया था, घर सजाया गया था, बच्चों की आंखों में पिता के सम्मान के दृश्य घूम रहे थे। लेकिन शाम तक वही घर मातम का केंद्र बन गया, जब तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर दरवाज़े पर पहुंचा। उस दृश्य को देख हर आंख नम हो गई और खुशी का माहौल शोक में बदल गया।
सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई, गूंज उठी मातमी धुन
सोमवार सुबह जब उनका पार्थिव शरीर देहरादून के गोरखपुर (प्रेमनगर) स्थित आवास पर लाया गया, तो वहां मातमी धुनों के बीच गोरखा राइफल्स की सैन्य टुकड़ी ने उन्हें अंतिम सलामी दी। गौरव सेनानी एसोसिएशन से जुड़े पूर्व सैनिकों ने पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत और विधायक सहदेव पुंडीर ने भी पहुंचकर परिजनों को सांत्वना दी।
इसके बाद पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए हरिद्वार ले जाया गया, जहां सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
पूर्व सैनिकों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
गौरव सेनानी एसोसिएशन के उपाध्यक्ष मनवर रौथाण, विक्रम कंडारी, गिरीश जोशी, देव सिंह पटवाल, विरेंद्र कंडारी, विनोद सिंह, लक्ष्मण सिंह, श्याप थापा, अजयवीर सिंह और उत्तम गुसाईं सहित बड़ी संख्या में पूर्व सैनिकों ने अंतिम यात्रा में भाग लेकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
पौड़ी जिले के सिमणी गांव से था नाता
हवलदार दिनेश चंद्र मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी जिले के राठ क्षेत्र के सिमणी गांव के निवासी थे, हालांकि पिछले कई वर्षों से वह देहरादून के प्रेमनगर (गोरखपुर) में अपने परिवार संग रह रहे थे। वे अपने पीछे पत्नी आनंदी देवी, तीन बेटे और दो बेटियों को छोड़ गए हैं।
उनकी आकस्मिक मृत्यु न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र और सैनिक समुदाय के लिए एक अपूरणीय क्षति है। एक समर्पित सैनिक जिसने दो बार देश सेवा का व्रत लिया, उनका यूं चले जाना हर किसी को भावुक कर गया।
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