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Haridwar Land Scam: आरोपियों के ठिकानों पर छापेमारी शुरू, IAS के घर पर भी विजिलेंस सर्च

On: June 26, 2026 11:35 AM
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Haridwar Land Scam: Vigilance officials conducting raids during the Haridwar Municipal Corporation land scam investigation at the premises of accused individuals.

Haridwar Land Scam: हरिद्वार नगर निगम की चर्चित जमीन खरीद मामले में अब जांच निर्णायक चरण में पहुंचती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये के इस कथित जमीन घोटाले में विजिलेंस ने कार्रवाई तेज करते हुए एफआईआर में नामजद आरोपियों के विभिन्न ठिकानों पर छापेमारी शुरू कर दी है। जांच एजेंसी दस्तावेजों, फाइलों और अन्य अहम साक्ष्यों की तलाश में जुटी है। इसी क्रम में एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के दिल्ली स्थित आवास पर भी सर्च ऑपरेशन चलाया गया है। विजिलेंस मुख्यालय, देहरादून से पूरी कार्रवाई की लगातार निगरानी की जा रही है।

Haridwar Land Scam:जांच रिपोर्ट के बाद तेज हुई कार्रवाई

सूत्रों के अनुसार, इस मामले में सीओ हर्षवर्धिनी सुमन द्वारा की गई जांच के बाद कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए थे। जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने कई अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की, जबकि कुछ के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई। अब विजिलेंस उन सभी तथ्यों की पुष्टि के लिए आरोपियों के ठिकानों से संबंधित दस्तावेज और अन्य साक्ष्य एकत्र कर रही है।

अधिकारियों का मानना है कि छापेमारी के दौरान मिलने वाले रिकॉर्ड से जमीन खरीद प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं की परतें और खुल सकती हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मामले में और भी बड़े खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।

54 करोड़ में खरीदी गई थी 33 बीघा जमीन

यह पूरा मामला वर्ष 2024 का है, जब निकाय चुनाव के दौरान हरिद्वार नगर निगम ने सराय गांव में लगभग 33 से 34 बीघा जमीन खरीदी थी। इस जमीन की खरीद पर करीब 53.70 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे।

हालांकि, वर्ष 2025 में यह मामला विवादों में तब आया जब आरोप लगे कि जिस जमीन की बाजार कीमत लगभग 15 करोड़ रुपये थी, उसे नगर निगम ने तीन गुना से भी अधिक कीमत पर खरीद लिया। इतना ही नहीं, खरीदी गई जमीन के समीप पहले से ही नगर निगम का कूड़ा डंपिंग यार्ड मौजूद था। ऐसे में सवाल उठे कि आखिर इतनी बड़ी रकम खर्च कर इस जमीन को खरीदने की आवश्यकता क्या थी।

भूमि की श्रेणी बदलकर बढ़ाई गई कीमत

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जमीन खरीद प्रक्रिया के बीच ही भूमि की श्रेणी (लैंड यूज) बदलने का पूरा खेल हुआ। बताया गया कि भूमि को धारा 143 के तहत कृषि भूमि से अन्य उपयोग के लिए परिवर्तित किया गया, जिससे उसकी कीमत में कई गुना वृद्धि हो गई।

जानकारी के अनुसार, भूमि की श्रेणी बदलने की प्रक्रिया 3 अक्टूबर 2024 से शुरू हुई और 6 अक्टूबर 2024 तक पूरी कर ली गई। वहीं, जमीन खरीद की कागजी प्रक्रिया 19 सितंबर 2024 से शुरू होकर 26 अक्टूबर 2024 तक चली। इसके बाद नवंबर महीने में अलग-अलग तारीखों पर विभिन्न लोगों से जमीन खरीदी गई।

जांच एजेंसियों का मानना है कि जमीन की श्रेणी परिवर्तन और खरीद प्रक्रिया का एक साथ चलना पूरे मामले को संदेह के दायरे में लाता है।

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14 दिन में पूरी हुई 143 की प्रक्रिया पर उठे सवाल

जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि धारा 143 के तहत भूमि उपयोग परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया महज 14 दिनों में पूरी कर दी गई। तत्कालीन एसडीएम अजय वीर सिंह ने आवेदन से लेकर परवाना अमलदरामद तक की प्रक्रिया बेहद कम समय में पूरी कर दी।

इसके अलावा, एसडीएम कोर्ट में राजस्व अभिलेखों से संबंधित मिश्लबंद रजिस्टर में भी कथित अनियमितता सामने आई। आरोप है कि पुराने रिकॉर्ड को दर्ज करने के बजाय नया मिश्लबंद तैयार किया गया, जिससे पूरे मामले पर और अधिक सवाल खड़े हो गए।

सरकारी जांच में घोटाले की पुष्टि

मामला सार्वजनिक होने के बाद राज्य सरकार ने इसकी जांच के आदेश दिए थे। जांच की जिम्मेदारी सचिव रणवीर सिंह चौहान को सौंपी गई। उनकी रिपोर्ट में जमीन खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद सरकार ने कई अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की।

सरकार ने तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र कुमार, तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी और पीसीएस अधिकारी अजय वीर सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की। वहीं, कई अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी विभागीय कार्रवाई की गई।

आईएएस अधिकारियों पर भी गिरी कार्रवाई की गाज

जांच रिपोर्ट में सामने आया कि उस समय निकाय चुनाव के कारण आचार संहिता लागू थी। ऐसे में नगर निगम का प्रशासनिक नियंत्रण तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी के पास था। रिपोर्ट के अनुसार, जमीन खरीद को अंतिम स्वीकृति भी उनके स्तर से दी गई थी।

इसी आधार पर सरकार ने आईएएस अधिकारी वरुण चौधरी को सेवा से बर्खास्त करने की संस्तुति की। वहीं, तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र कुमार के खिलाफ मेजर पेनल्टी की कार्रवाई का निर्णय लिया गया। पीसीएस अधिकारी अजय वीर सिंह की तीन वेतन वृद्धियां रोकने के भी निर्देश जारी किए गए।

सबूत जुटाने में जुटी विजिलेंस, बढ़ सकती हैं कई और मुश्किलें

अब विजिलेंस की टीम इस पूरे मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच कर रही है। अधिकारियों का उद्देश्य यह पता लगाना है कि जमीन की खरीद, मूल्य निर्धारण और भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया में किन-किन स्तरों पर नियमों की अनदेखी हुई।

सूत्रों का कहना है कि जांच के दौरान यदि नए साक्ष्य सामने आते हैं तो इस मामले में और भी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल विजिलेंस की छापेमारी को इस बहुचर्चित जमीन घोटाले की सबसे अहम कार्रवाई माना जा रहा है।

जांच पर टिकी सबकी नजर

हरिद्वार नगर निगम जमीन खरीद मामला लंबे समय से उत्तराखंड के सबसे चर्चित मामलों में शामिल रहा है। अब विजिलेंस की सक्रियता से यह संकेत मिल रहा है कि जांच अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है। छापेमारी के दौरान मिलने वाले दस्तावेज और अन्य साक्ष्य यह तय करेंगे कि इस बहुचर्चित मामले में आगे किन अधिकारियों और अन्य संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय होती है। आने वाले दिनों में इस प्रकरण में और बड़े खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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