उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में सामने आया gopeshwar bear attack का यह मामला बेहद दर्दनाक और डरावना है। पोखरी विकासखंड के पास जंगल में घास काटने गई दो ग्रामीण महिलाओं के सामने अचानक खूंखार भालू आ गया। भालू से अपनी जान बचाने के लिए भागते समय दोनों महिलाएं अनियंत्रित होकर 300 मीटर गहरी सीधी चट्टानी खाई में जा गिरीं। भीषण हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई दोनों महिलाओं ने इलाज के क्रम में दम तोड़ दिया। इस हृदयविदारक घटना के बाद से पूरे सीमांत जिले और आसपास के गांवों में मातम और दहशत का माहौल छाया हुआ है।
gopeshwar bear attack: कैसे और कहां हुआ यह भयानक हादसा?
यह दुखद घटना उत्तराखंड के चमोली जिले के अंतर्गत आने वाले गोपेश्वर क्षेत्र के पोखरी विकासखंड की है। ग्राम पंचायत नैल के सिदेली तोक में रोजाना की तरह ग्रामीण महिलाएं मवेशियों के लिए चारा व घास एकत्र करने गांव के समीपवर्ती जंगल की तरफ गई थीं।
प्रत्यक्षदर्शियों और ग्रामीणों के अनुसार, सुबह के समय जब महिलाएं झाड़ियों के पास काम कर रही थीं, तभी अचानक एक खूंखार जंगली भालू गुर्राते हुए उनके सामने आ धमका। भालू को अपने बिल्कुल करीब पाकर दोनों महिलाएं घबरा गईं और जान बचाने के लिए उल्टे पांव भागने लगीं। भालू ने आक्रामक रुख अपनाते हुए उनका पीछा करना शुरू कर दिया। घबराहट और पहाड़ी ढलान के कारण महिलाओं का संतुलन बिगड़ गया और वे लगभग 300 मीटर गहरी पथरीली खाई में नीचे जा गिरीं।
हादसे की शिकार मृतकाओं की पहचान
पथरीली चट्टानों से नीचे गिरने के कारण दोनों महिलाओं के सिर, रीढ़ और शरीर के अन्य हिस्सों पर गंभीर चोटें आईं। इस gopeshwar bear attack से जुड़े हादसे में जान गंवाने वाली महिलाओं का विवरण इस प्रकार है:
- लक्ष्मी देवी (उम्र 42 वर्ष), पत्नी श्री गजेंद्र सिंह, निवासी ग्राम नैल (सिदेली तोक), पोखरी।
- विमला देवी (उम्र 50 वर्ष), पत्नी श्री चंद्रशेखर सिंह, निवासी ग्राम नैल (सिदेली तोक), पोखरी।
दोनों महिलाएं गांव की कर्मठ और मेहनती गृहिणी थीं, जिनकी इस असमय मृत्यु से परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
ग्रामीणों ने चलाया रेस्क्यू ऑपरेशन, अस्पताल में तोड़ा दम
घटना की भनक लगते ही चीख-पुकार सुनकर आसपास के खेतों व घरों से ग्रामीण तुरंत घटनास्थल की ओर दौड़े। ग्रामीणों ने अपनी जान जोखिम में डालकर भारी मशक्कत के बाद 300 मीटर गहरी खाई में उतरकर दोनों घायल महिलाओं को बाहर निकाला।
आनन-फानन में ग्रामीणों की मदद से दोनों को निकटतम सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) पोखरी पहुंचाया गया। अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल टीम ने प्राथमिक उपचार शुरू किया, लेकिन अधिक खून बह जाने और अंदरूनी गंभीर चोटों के कारण दोनों महिलाओं की जान नहीं बचाई जा सकी। चिकित्सालय प्रशासन ने घटना की सूचना स्थानीय पुलिस और वन विभाग की टीम को दी।
पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष और जनआक्रोश
पहाड़ी राज्यों में gopeshwar bear attack जैसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं, जिससे आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों में दैनिक दिनचर्या जैसे लकड़ी चुनना, घास काटना या मवेशी चराना बेहद जोखिम भरा काम बन चुका है।
- वन विभाग की गश्त पर सवाल: स्थानीय निवासियों का आरोप है कि रिहाइशी बस्तियों के आसपास खूंखार जानवरों की आवाजाही की लगातार शिकायत करने के बावजूद वन विभाग द्वारा नियमित गश्त नहीं की जाती।
- पिंजरा लगाने की मांग: ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन और वन विभाग से क्षेत्र में तत्काल गश्त बढ़ाने और आक्रामक भालू को पकड़ने के लिए पिंजरा लगाने की पुरजोर मांग की है।
- मुआवजे की गुहार: पीड़ित परिवारों को शासन स्तर से उचित आर्थिक मुआवजा और सुरक्षा देने की मांग उठ रही है।
जंगल जाते समय बरतें ये जरूरी सावधानियां
वन विभाग और स्थानीय विशेषज्ञों ने ग्रामीणों को जंगल या एकांत रास्तों पर जाते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतने की सलाह दी है:
- समूह में निकलें: कभी भी जंगल या ढलान वाले इलाकों में अकेले न जाएं। हमेशा 3-4 लोगों के समूह में रहें।
- शोर मचाते रहें: चलते समय आपस में बातचीत करें, गाना गाएं या हाथ में लाठी रखकर जमीन पर पटकते रहें ताकि जंगली जानवर दूर हट जाएं।
- अचानक न भागें: यदि सामने भालू आ जाए तो एकदम से घबराकर खाई या खतरनाक ढलान की तरफ न भागें, बल्कि धैर्य रखकर धीरे-धीरे सुरक्षित स्थान की ओर बढ़ें।
इस gopeshwar bear attack की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि पहाड़ों में सुरक्षा के ठोस इंतजाम न होने से आए दिन निर्दोष ग्रामीणों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। यदि प्रशासन ने जल्द ही जंगली जानवरों के आतंक पर लगाम लगाने के ठोस कदम नहीं उठाए, तो ग्रामीण उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
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