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गंगा दशहरा: श्रद्धा, संस्कृति और संकल्प का पर्व

On: June 5, 2025 5:48 AM
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हरिद्वार में गंगा दशहरे और निर्जला एकादशी स्नान पर्व के अवसर पर आस्था का सागर उमड़ पड़ा। श्रद्धालुओं ने गंगा तटों पर पहुँचकर पुण्य की डुबकी लगाई और अपनी आस्था को प्रकट किया। धर्मनगरी हरिद्वार में भारी भीड़ के कारण हरिद्वार-देहरादून हाईवे पर लंबा जाम लग गया। इसे देखते हुए पुलिस ने पहले से ही 5 से 7 जून तक के लिए यातायात प्लान लागू कर दिया है, जिसके तहत बुधवार रात 12 बजे से भारी वाहनों का प्रवेश रोक दिया गया।

इस वर्ष गंगा दशहरा का पर्व और भी विशेष बन गया है क्योंकि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र, सिद्धि योग और व्यतिपात योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है। यह संयोग कई दशकों बाद बना है, जिसे अत्यंत शुभ और फलदायी माना जा रहा है। मान्यता है कि इसी दिन राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं, ताकि उनके पूर्वजों को मोक्ष मिल सके। तब से यह पर्व भारतीय संस्कृति और आध्यात्म का प्रतीक बन गया है।

गंगा दशहरा केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का भी दिन है। स्नान, दान, जप, तप और उपवास से इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस शुभ योग में गंगा पूजन विशेष फलदायी होता है और व्यक्ति के जीवन में कल्याणकारी प्रभाव लाता है। मां गंगा को भारतीय संस्कृति की आत्मा और जीवनदायिनी शक्ति माना जाता है, जो युगों से सबको जीवन और मुक्ति देती आ रही हैं।

हालांकि, इस पवित्र अवसर पर गंगा तट पर कुछ गलत आदतें भी देखने को मिलती हैं, जिनसे बचना ज़रूरी है। गंगा में स्नान करते समय शरीर का मैल या कपड़े नहीं धोने चाहिए, और न ही प्लास्टिक या अन्य कचरे को गंगा में फेंकना चाहिए। इसके बजाय, मिट्टी के दीपकों में शुद्ध घी का दीप जलाकर गंगा को अर्पित करना उचित माना जाता है। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक उन्नति का अवसर है, बल्कि गंगा को स्वच्छ और पवित्र रखने का संकल्प लेने का भी दिन है।

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