इस साल उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाओं में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, जिसका मुख्य कारण रहा मौसम का अनुकूल रहना। फायर सीजन की शुरुआत 15 फरवरी से हुई, लेकिन इस दौरान लगातार बदलते मौसम और वातावरण में नमी ने आग को फैलने से पहले ही रोक दिया। खासकर मार्च से मई तक हुई सामान्य से 32 प्रतिशत अधिक बारिश ने स्थिति को काफी हद तक काबू में रखा। इससे न केवल जंगल बचे, बल्कि वन विभाग को भी राहत की सांस मिली।
प्रदेश में जहां बागेश्वर ज़िले में 144% अधिक वर्षा दर्ज की गई, वहीं पिथौरागढ़ में सबसे कम -6% बारिश हुई। फिर भी कुल मिलाकर अधिकतर इलाकों में बारिश ने अपनी भूमिका निभाई और जंगलों में आग को विकराल रूप लेने से रोका। पूरे फायर सीजन (15 फरवरी से 31 मई) के दौरान सिर्फ 203 घटनाएं सामने आईं, जिनमें लगभग 226 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ — यह पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम है।
वन विभाग ने हालात को नियंत्रण में रखने के लिए लगातार निगरानी बनाए रखी है। मसूरी वन प्रभाग की रायपुर रेंज में स्थित मालसी मास्टर कंट्रोल रूम और क्रू स्टेशनों का निरीक्षण अपर प्रमुख वन संरक्षक निशांत वर्मा द्वारा किया गया। उन्होंने जंगल में आग नियंत्रण के उपायों की समीक्षा करते हुए आवश्यक निर्देश भी दिए।
इस निरीक्षण के दौरान उत्तराखंड फारेस्ट फायर एप और एफएसआई अलर्ट सिस्टम जैसी तकनीकों की समीक्षा की गई। सात रेंजों में फैले 43 क्रू स्टेशन और 16 बेस स्टेशनों से मिल रही सूचनाएं मालसी कंट्रोल रूम के ज़रिए समन्वित की जा रही हैं। विभाग की इस सतर्कता और मौसम के सहयोग से उम्मीद की जा रही है कि आगामी मानसून से पहले भी प्रदेश को जंगल की आग से बड़ी राहत मिलती रहेगी।
यह भी पढ़ें : प्रदेश की 10,000 से अधिक पंचायतें खाली, अध्यादेश अटका तकनीकी पेच में





