Dussehra 2026: भारत में दशहरा सिर्फ रावण दहन का त्योहार नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक भी है। उत्तर भारत में जहां विजयादशमी पर भगवान राम की रावण पर विजय का उत्सव मनाया जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा को विदाई दी जाती है। महाराष्ट्र में सोने के प्रतीक के रूप में पत्तियां बांटने की परंपरा है, तो कर्नाटक के मैसूर में शाही जुलूस आकर्षण का केंद्र बनता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर और हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा मनाने का अंदाज देश के दूसरे हिस्सों से बिल्कुल अलग है।
इस साल Dussehra 2026 का पर्व 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है। आइए जानते हैं कि देश के अलग-अलग राज्यों में दशहरा किस तरह मनाया जाता है और इन परंपराओं के पीछे क्या खास मान्यताएं हैं।
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उत्तर प्रदेश और दिल्ली: रामलीला के बाद होता है रावण दहन
उत्तर प्रदेश और दिल्ली में दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण रामलीला और रावण दहन होता है। नवरात्रि के दौरान कई शहरों और कस्बों में भगवान राम के जीवन पर आधारित रामलीला का मंचन किया जाता है। विजयादशमी की शाम रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले जलाए जाते हैं।
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दिल्ली के रामलीला मैदान और उत्तर प्रदेश के वाराणसी सहित कई शहरों में रामलीला की पुरानी परंपरा देखने को मिलती है। रावण दहन के जरिए लोगों को अहंकार, अन्याय और बुराई का त्याग करने का संदेश दिया जाता है। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ शामिल होते हैं।
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राजस्थान: कोटा के दशहरा मेले की अलग पहचान
राजस्थान में दशहरा धार्मिक उत्सव के साथ-साथ लोक संस्कृति और मेलों का भी अवसर है। कोटा का दशहरा मेला अपनी भव्यता के लिए जाना जाता है। यहां विशाल रावण के पुतले का दहन किया जाता है और मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, मनोरंजन तथा स्थानीय उत्पादों की रौनक देखने को मिलती है।
राजस्थान की पारंपरिक संस्कृति में शस्त्र पूजा का भी महत्व है। कई समुदायों में विजयादशमी पर अस्त्र-शस्त्रों की पूजा कर शक्ति, साहस और विजय की कामना की जाती है।
पश्चिम बंगाल और ओडिशा: सिंदूर खेला और मां दुर्गा को विदाई
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के अंतिम दिन विजयादशमी भावनाओं और उत्सव का अनूठा संगम लेकर आती है। मान्यता है कि मां दुर्गा अपने मायके से विदा होकर कैलाश लौटती हैं। इस अवसर पर विवाहित महिलाएं पारंपरिक रूप से सिंदूर खेला की रस्म निभाती हैं। वे मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
इसके बाद दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। ढाक की थाप, पारंपरिक गीत और श्रद्धालुओं की भागीदारी इस उत्सव को खास बनाते हैं। ओडिशा में भी दुर्गा पूजा और विजयादशमी से जुड़ी धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं। हालांकि, विसर्जन और पूजा की तारीख स्थानीय परंपरा तथा आयोजन के कार्यक्रम के अनुसार अलग हो सकती है।
गुजरात: गरबा और डांडिया के साथ नवरात्रि का समापन
गुजरात में नवरात्रि के नौ दिन गरबा और डांडिया रास की धूम रहती है। रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहनकर लोग देवी दुर्गा की आराधना करते हैं और सामूहिक नृत्य में हिस्सा लेते हैं। विजयादशमी के साथ इस उत्सवी दौर का समापन होता है।
गुजरात में दशहरे के अवसर पर फाफड़ा और जलेबी खाने की परंपरा भी काफी लोकप्रिय है। त्योहार के दिन बाजारों और मिठाई की दुकानों पर लोगों की भीड़ दिखाई देती है। यहां दशहरा धार्मिक आस्था के साथ खानपान और सामुदायिक उत्सव का भी प्रतीक है।
महाराष्ट्र: पत्तियों को सोना मानकर बांटते हैं लोग
महाराष्ट्र में विजयादशमी पर एक खास परंपरा निभाई जाती है। लोग शमी या आपटा के पेड़ की पत्तियों को सोने का प्रतीक मानकर अपने परिजनों, दोस्तों और परिचितों को देते हैं। इसे सुख, समृद्धि और शुभकामनाओं के आदान-प्रदान से जोड़कर देखा जाता है।
इसके अलावा, कई जगहों पर शस्त्र पूजा और सीमोल्लंघन की परंपरा भी प्रचलित है। सीमोल्लंघन का संबंध पारंपरिक रूप से सीमाओं को पार कर विजय और नए कार्यों की शुरुआत करने की मान्यता से जोड़ा जाता है। इस तरह महाराष्ट्र में दशहरा नई उम्मीदों और समृद्धि का संदेश देता है।
कर्नाटक: मैसूर दशहरा की शाही जंबो सवारी
कर्नाटक का मैसूर दशहरा देश के सबसे प्रसिद्ध दशहरा आयोजनों में शामिल है। इस दौरान मैसूर पैलेस को रोशनी से सजाया जाता है और शहर में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विजयादशमी के दिन निकलने वाली जंबो सवारी उत्सव का प्रमुख आकर्षण होती है।
इस शाही जुलूस में देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को सजे हुए हाथी पर रखे स्वर्ण हौदे में विराजमान किया जाता है। पारंपरिक संगीत, लोक कलाकारों और सजे-धजे जुलूस के बीच यह आयोजन कर्नाटक की ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक आस्था को प्रदर्शित करता है।
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल: शिक्षा और परंपरा का पर्व
दक्षिण भारत के कई हिस्सों में दशहरे का संबंध देवी पूजा, कला और शिक्षा से भी जुड़ा है। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में नवरात्रि के दौरान घरों में गुड़ियों और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को सीढ़ीनुमा मंच पर सजाने की परंपरा है। इसे तमिलनाडु में गोलू और तेलुगु परंपरा में बोम्माला कोलुवु जैसे नामों से जाना जाता है।
केरल में विजयादशमी के अवसर पर विद्यारंभम की रस्म निभाई जाती है। इस परंपरा में छोटे बच्चों को पहली बार अक्षरों से परिचित कराया जाता है और उनकी औपचारिक शिक्षा की शुरुआत का शुभ अवसर माना जाता है। इस तरह यहां दशहरा ज्ञान और सीखने के नए सफर से भी जुड़ा है।
छत्तीसगढ़: बस्तर का अनोखा दशहरा, जहां नहीं होता रावण दहन
छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण देशभर में अलग पहचान रखता है। यह उत्सव भगवान राम और रावण की कथा पर केंद्रित नहीं है। यहां दशहरा मुख्य रूप से स्थानीय आदिवासी संस्कृति और आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित होता है।
इस लंबे उत्सव में पारंपरिक रस्में, विशाल रथयात्रा और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़े आयोजन होते हैं। इसकी अवधि और अलग-अलग रस्में निर्धारित परंपरागत कैलेंडर के अनुसार चलती हैं। बस्तर का दशहरा इस बात का उदाहरण है कि एक ही त्योहार अलग-अलग क्षेत्रों में बिल्कुल अलग सांस्कृतिक स्वरूप अपना सकता है।
हिमाचल प्रदेश: कुल्लू दशहरे में होता है देवी-देवताओं का मिलन
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा देश के कई अन्य हिस्सों से अलग समय और अंदाज में मनाया जाता है। यहां उत्सव विजयादशमी के दिन शुरू होता है और कई दिनों तक चलता है। इस दौरान घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं की सजी हुई पालकियां ढालपुर मैदान में लाई जाती हैं।
भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और स्थानीय देवी-देवताओं का एकत्र होना इस आयोजन की खास पहचान है। कुल्लू दशहरे में पारंपरिक संगीत, लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहां रावण दहन पर जोर नहीं होता, बल्कि देव-मिलन और स्थानीय परंपराएं उत्सव का केंद्र रहती हैं।
Dussehra 2026: अलग परंपराएं, लेकिन संदेश एक
Dussehra 2026 भारत की सांस्कृतिक विविधता को समझने का अवसर है। कहीं रावण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, तो कहीं मां दुर्गा की विदाई, सोने के प्रतीक के रूप में पत्तियां बांटने, शाही जुलूस निकालने या बच्चों की शिक्षा शुरू करने की परंपरा निभाई जाती है।
इन सभी आयोजनों का स्वरूप अलग जरूर है, लेकिन इनके केंद्र में आस्था, सद्भाव, नई शुरुआत और सकारात्मकता का भाव मौजूद है। यही वजह है कि दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारत की विविध संस्कृतियों को एक साथ जोड़ने वाला महत्वपूर्ण उत्सव भी है।








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