देहरादून (विशेष ब्यूरो): राजधानी देहरादून के शांत और हरे-भरे क्षेत्र धौलास में इन दिनों भारी हलचल है। कभी अपनी शुद्ध हवा और साल-सागौन के जंगलों के लिए पहचाना जाने वाला यह क्षेत्र आज भू-माफियाओं की सक्रियता, अवैध प्लॉटिंग और जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) की चर्चाओं के केंद्र में है। एक मुस्लिम शिक्षण संस्थान की भूमि पर चल रहे जमीन के सौदों ने शासन से लेकर प्रशासन तक की नींद उड़ा दी है।
विवाद की जड़: संस्थान की जमीन और ‘लैंड यूज’ का खेल
धौलास की चर्चा तब शुरू हुई जब एक बड़े मुस्लिम संस्थान की जमीन पर अवैध रूप से प्लॉटिंग कर उसे बेचने के मामले सामने आए। आरोप है कि कृषि और संस्थान की भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर बाहरी लोगों को बेचा जा रहा है। इस मामले ने न केवल भूमि कानूनों के उल्लंघन का सवाल खड़ा किया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर डेमोग्राफी में होने वाले बदलाव की बहस को भी जन्म दे दिया है।
शासन ने इस क्षेत्र को ‘संवेदनशील’ घोषित कर दिया है और रजिस्ट्री से लेकर सीमांकन तक के दस्तावेजों की बारीकी से जांच शुरू कर दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो शिवालिक की तराई में बसा यह क्षेत्र पारिस्थितिक और सामाजिक रूप से असंतुलित हो जाएगा।
“मैं धौलास हूँ…” – प्रकृति की खामोश चीख
विवादों के शोर के बीच धौलास की अपनी एक पहचान है, जो फाइलों में कहीं दब गई है। यदि धौलास स्वयं बोल पाता, तो वह कहता— “मैं केवल रजिस्ट्री और खतौनी का टुकड़ा नहीं हूँ, मैं शिवालिक की गोद में बसा हरियाली का वह संसार हूँ, जहाँ सुबह की पहली किरण पहाड़ियों को चूमती है।”
धौलास देहरादून घाटी का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जहाँ पहाड़ और मैदान का मिलन होता है। यहाँ के साल और सागौन के वृक्ष सदियों से इस क्षेत्र के प्रहरी रहे हैं। लेकिन आज विकास की अंधी दौड़ ने इन पेड़ों की छांव को कंक्रीट के जंगलों में बदलने की तैयारी कर ली है। यहाँ की मिट्टी की नमी और छोटे जलस्रोत इस क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से (Ecologically) अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं।
इतिहास और वर्तमान का द्वंद्व
धौलास का इतिहास गढ़वाल अंचल की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। अंग्रेजी शासन काल में यहाँ के वन प्रबंधन की नीतियां बनीं और आजादी के बाद यहाँ के लोगों ने खेती और पशुपालन को अपना आधार बनाया। यहाँ के निवासियों के लिए जमीन कभी ‘बाजार की वस्तु’ नहीं थी, बल्कि उनकी जीवनरेखा थी।
परिवर्तन तब आया जब शहर का विस्तार हुआ और सड़कें धौलास तक पहुँच गईं। बाहरी निवेशकों की नजरें इस शांत वादी पर पड़ीं और देखते ही देखते ‘निवेश’ के नाम पर प्रकृति का चीरहरण शुरू हो गया। आज यहाँ की पगडंडियां उन कदमों की आहट खोज रही हैं जो मिट्टी से जुड़े थे, न कि उन लोगों की जो यहाँ केवल मुनाफे के लिए आए हैं।
प्रशासन की सख्ती: रडार पर भू-सौदागर
भूमि विवादों और डेमोग्राफी परिवर्तन की खबरों के बाद जिला प्रशासन ने धौलास में होने वाली हर रजिस्ट्री पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी है।
अवैध कब्जा: सरकारी भूमि और वन भूमि पर हुए अतिक्रमण को चिन्हित कर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की योजना है।
निष्कर्ष: पहचान बचाने की चुनौती
धौलास आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ ‘विकास’ और ‘निवेश’ के बड़े वादे हैं, तो दूसरी तरफ अपनी मूल पहचान और पर्यावरण को बचाने की चुनौती। विवादों की धूल आज नहीं तो कल बैठ जाएगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या भविष्य का धौलास अपनी उस ‘हरित आभा’ को बचा पाएगा जिसके लिए वह जाना जाता है?
बाजार की कीमतों और भू-दस्तावेजों से परे, धौलास की असली पहचान उसके जंगल, पहाड़ और शांत वातावरण में है। प्रशासन और जनता को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि धौलास की यह ‘खामोश किताब’ अवैध प्लॉटिंग के पन्नों में कहीं खो न जाए।देहरादून (विशेष ब्यूरो): राजधानी देहरादून के शांत और हरे-भरे क्षेत्र धौलास में इन दिनों भारी हलचल है। कभी अपनी शुद्ध हवा और साल-सागौन के जंगलों के लिए पहचाना जाने वाला यह क्षेत्र आज भू-माफियाओं की सक्रियता, अवैध प्लॉटिंग और जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) की चर्चाओं के केंद्र में है। एक मुस्लिम शिक्षण संस्थान की भूमि पर चल रहे जमीन के सौदों ने शासन से लेकर प्रशासन तक की नींद उड़ा दी है।
विवाद की जड़: संस्थान की जमीन और ‘लैंड यूज’ का खेल
धौलास की चर्चा तब शुरू हुई जब एक बड़े मुस्लिम संस्थान की जमीन पर अवैध रूप से प्लॉटिंग कर उसे बेचने के मामले सामने आए। आरोप है कि कृषि और संस्थान की भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर बाहरी लोगों को बेचा जा रहा है। इस मामले ने न केवल भूमि कानूनों के उल्लंघन का सवाल खड़ा किया है, बल्कि स्थानीय स्तर पर डेमोग्राफी में होने वाले बदलाव की बहस को भी जन्म दे दिया है।
शासन ने इस क्षेत्र को ‘संवेदनशील’ घोषित कर दिया है और रजिस्ट्री से लेकर सीमांकन तक के दस्तावेजों की बारीकी से जांच शुरू कर दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो शिवालिक की तराई में बसा यह क्षेत्र पारिस्थितिक और सामाजिक रूप से असंतुलित हो जाएगा।
“मैं धौलास हूँ…” – प्रकृति की खामोश चीख
विवादों के शोर के बीच धौलास की अपनी एक पहचान है, जो फाइलों में कहीं दब गई है। यदि धौलास स्वयं बोल पाता, तो वह कहता— “मैं केवल रजिस्ट्री और खतौनी का टुकड़ा नहीं हूँ, मैं शिवालिक की गोद में बसा हरियाली का वह संसार हूँ, जहाँ सुबह की पहली किरण पहाड़ियों को चूमती है।”
धौलास देहरादून घाटी का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जहाँ पहाड़ और मैदान का मिलन होता है। यहाँ के साल और सागौन के वृक्ष सदियों से इस क्षेत्र के प्रहरी रहे हैं। लेकिन आज विकास की अंधी दौड़ ने इन पेड़ों की छांव को कंक्रीट के जंगलों में बदलने की तैयारी कर ली है। यहाँ की मिट्टी की नमी और छोटे जलस्रोत इस क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से (Ecologically) अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं।
इतिहास और वर्तमान का द्वंद्व
धौलास का इतिहास गढ़वाल अंचल की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। अंग्रेजी शासन काल में यहाँ के वन प्रबंधन की नीतियां बनीं और आजादी के बाद यहाँ के लोगों ने खेती और पशुपालन को अपना आधार बनाया। यहाँ के निवासियों के लिए जमीन कभी ‘बाजार की वस्तु’ नहीं थी, बल्कि उनकी जीवनरेखा थी।
परिवर्तन तब आया जब शहर का विस्तार हुआ और सड़कें धौलास तक पहुँच गईं। बाहरी निवेशकों की नजरें इस शांत वादी पर पड़ीं और देखते ही देखते ‘निवेश’ के नाम पर प्रकृति का चीरहरण शुरू हो गया। आज यहाँ की पगडंडियां उन कदमों की आहट खोज रही हैं जो मिट्टी से जुड़े थे, न कि उन लोगों की जो यहाँ केवल मुनाफे के लिए आए हैं।
प्रशासन की सख्ती: रडार पर भू-सौदागर
भूमि विवादों और डेमोग्राफी परिवर्तन की खबरों के बाद जिला प्रशासन ने धौलास में होने वाली हर रजिस्ट्री पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी है।
GIS मैपिंग: क्षेत्र की कृषि और वन भूमि की जीआईएस मैपिंग के निर्देश दिए गए हैं।
दस्तावेजों की जांच: संस्थान को मिली जमीन के मूल स्वरूप और वर्तमान स्थिति की तुलना की जा रही है।
- GIS मैपिंग: क्षेत्र की कृषि और वन भूमि की जीआईएस मैपिंग के निर्देश दिए गए हैं।
- दस्तावेजों की जांच: संस्थान को मिली जमीन के मूल स्वरूप और वर्तमान स्थिति की तुलना की जा रही है।
- अवैध कब्जा: सरकारी भूमि और वन भूमि पर हुए अतिक्रमण को चिन्हित कर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की योजना है।
निष्कर्ष: पहचान बचाने की चुनौती
धौलास आज एक चौराहे पर खड़ा है। एक तरफ ‘विकास’ और ‘निवेश’ के बड़े वादे हैं, तो दूसरी तरफ अपनी मूल पहचान और पर्यावरण को बचाने की चुनौती। विवादों की धूल आज नहीं तो कल बैठ जाएगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या भविष्य का धौलास अपनी उस ‘हरित आभा’ को बचा पाएगा जिसके लिए वह जाना जाता है?
बाजार की कीमतों और भू-दस्तावेजों से परे, धौलास की असली पहचान उसके जंगल, पहाड़ और शांत वातावरण में है। प्रशासन और जनता को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि धौलास की यह ‘खामोश किताब’ अवैध प्लॉटिंग के पन्नों में कहीं खो न जाए।







