CEC Protest: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के संबंध में पुलिस ने सात दिनों के भीतर 27 एफआईआर दर्ज की हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन मामलों में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की चार धाराएं सबसे अधिक बार लगाई गई हैं। एफआईआर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के नाम भी शामिल बताए गए हैं। हालांकि, किसी एफआईआर में नाम दर्ज होना अपने आप में अपराध साबित होने के बराबर नहीं है।
कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों के INDIA गठबंधन ने चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की है। दूसरी ओर, प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर नियमों के उल्लंघन, पुलिसकर्मियों के काम में बाधा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे आरोपों को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की है।
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
CEC Protest सात दिनों में 27 FIR, किन मामलों में हुई कार्रवाई?
प्रदर्शनों से जुड़ी एफआईआर के आकलन के अनुसार, पुलिस की कार्रवाई कई तरह के कथित उल्लंघनों से संबंधित है। इनमें सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जारी आदेशों की अवहेलना, लोक सेवकों के काम में बाधा डालने और ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ कथित बल प्रयोग जैसे आरोप शामिल हैं।
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
कुछ मामलों में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित कानून के प्रावधान भी लगाए गए हैं। नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा के उल्लंघन का आरोप भी कार्रवाई का हिस्सा बताया गया है।
यहां ध्यान देना जरूरी है कि एफआईआर में दर्ज आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होती है। इसलिए इन मामलों को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित जांच और अदालत की कार्यवाही को देखना जरूरी होगा।
इन 4 BNS धाराओं का सबसे ज्यादा इस्तेमाल
उपलब्ध एफआईआर आकलन में चार धाराओं का बार-बार उल्लेख किया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, धारा 3(5) को 22 एफआईआर में, धारा 223(a) को 18 एफआईआर में और धारा 221 तथा धारा 132 को 17-17 एफआईआर में शामिल किया गया है।
1. BNS धारा 3(5): साझा इरादे से किए गए अपराध की जिम्मेदारी
धारा 3(5) भारतीय न्याय संहिता के तहत साझा इरादे से कई लोगों द्वारा किए गए आपराधिक कृत्य में प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी से संबंधित है। जब कोई आपराधिक कृत्य कई लोगों की ओर से साझा इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार यह प्रावधान लागू हो सकता है।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार, प्रदर्शन से संबंधित 27 में से 22 एफआईआर में इस धारा का उल्लेख है। यह सबसे अधिक दर्ज की गई धाराओं में शामिल है। हालांकि, किसी व्यक्ति पर इसकी लागू होने की स्थिति मामले के तथ्यों और सबूतों पर निर्भर करेगी।
READ: वन मंजूरी में देरी से अटका काम, मुख्य सचिव ने हर टावर के लिए तय की डेडलाइन
2. BNS धारा 223(a): सरकारी आदेश की अवहेलना
धारा 223 लोक सेवक की ओर से विधिवत जारी आदेश की अवज्ञा से संबंधित है। इसके तहत कार्रवाई की स्थिति आदेश की प्रकृति, उसके पालन की कानूनी बाध्यता और कथित उल्लंघन की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
आकलन के अनुसार, 18 एफआईआर में धारा 223(a) शामिल की गई है। प्रदर्शन के संदर्भ में यह धारा निषेधाज्ञा या अन्य लागू आदेशों के कथित उल्लंघन से जुड़ी हो सकती है। हालांकि, सटीक आरोप और उनका आधार प्रत्येक एफआईआर में अलग हो सकता है।
3. BNS धारा 221: लोक सेवक के काम में बाधा
धारा 221 सरकारी कामकाज के दौरान लोक सेवक के कार्य में बाधा डालने से संबंधित है। प्रदर्शन के दौरान यदि किसी लोक सेवक के कानूनी कर्तव्यों के निर्वहन में कथित तौर पर रुकावट डाली गई हो, तो मामले के तथ्यों के आधार पर इस प्रावधान पर विचार किया जा सकता है।
प्रदर्शन से जुड़ी 17 एफआईआर में इस धारा का उल्लेख किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसका इस्तेमाल किए जाने मात्र से आरोप साबित नहीं हो जाता; इसके लिए संबंधित साक्ष्यों की जांच जरूरी होती है।
4. BNS धारा 132: ड्यूटी से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल
धारा 132 किसी लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के इरादे से हमला करने या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने से संबंधित है। पुलिसकर्मियों के साथ कथित धक्का-मुक्की या बल प्रयोग जैसे आरोपों की परिस्थितियों में इस प्रावधान की प्रासंगिकता की जांच की जा सकती है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 17 एफआईआर में धारा 132 भी लगाई गई है। प्रत्येक मामले में यह देखना होगा कि कथित घटना के दौरान क्या हुआ और आरोपों के समर्थन में कौन-से सबूत मौजूद हैं।
सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप भी
एफआईआर के आकलन में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित कानून की धारा 3 का भी उल्लेख किया गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह प्रावधान नौ एफआईआर में शामिल है।
इसके अलावा, कुछ मामलों में चोट पहुंचाने, रास्ता रोकने, गलत तरीके से बंधक बनाने और लोक सेवकों को ड्यूटी से रोकने के लिए चोट पहुंचाने से संबंधित BNS की अन्य धाराओं का भी उल्लेख किया गया है। कुछ एफआईआर में महिलाओं के खिलाफ कथित अपराधों से संबंधित प्रावधान शामिल होने की बात भी कही गई है।
हालांकि, इन सभी धाराओं को हर प्रदर्शनकारी पर लागू मानना सही नहीं होगा। आरोपों की प्रकृति संबंधित घटना, दर्ज एफआईआर और व्यक्ति की कथित भूमिका के आधार पर तय होती है।
क्या है पूरा राजनीतिक विवाद?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस और INDIA गठबंधन से जुड़े नेताओं ने प्रदर्शन के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया है। दूसरी तरफ, पुलिस की कार्रवाई कानून-व्यवस्था और कथित उल्लंघनों से जुड़े मामलों पर केंद्रित बताई गई है।
इस घटनाक्रम में दो पहलुओं को अलग-अलग समझना जरूरी है। पहला, विपक्ष का चुनाव आयोग को लेकर राजनीतिक विरोध और उसके पीछे उठाए गए सवाल। दूसरा, प्रदर्शन के दौरान कानून तोड़ने के आरोपों पर पुलिस की कार्रवाई। किसी राजनीतिक मांग या विरोध प्रदर्शन की वैधता का सवाल और किसी खास घटना में कानून के कथित उल्लंघन का सवाल अलग-अलग हैं।
आगे क्या होगा?
दर्ज एफआईआर में जांच के बाद पुलिस संबंधित सबूतों, गवाहों और प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका के आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकती है। जिन मामलों में आरोपपत्र दाखिल किया जाता है, उनमें आरोपों की न्यायिक जांच होती है और दोषसिद्धि का फैसला अदालत करती है।
दिल्ली में CEC के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़े इन मामलों में आगे की स्थिति संबंधित एफआईआर, पुलिस की जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी। फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सात दिनों में 27 एफआईआर दर्ज हुईं और चार BNS धाराओं का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया। इस मामले में आरोपों और सिद्ध तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।











