Russian Oil India: भारत की ऊर्जा जरूरतों के बीच Russian Oil India एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। अमेरिकी टैरिफ और रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर दबाव के बीच यह सवाल उठ रहा है कि अगर भारत रूसी तेल की खरीद में बड़ी कटौती करता है, तो उसकी जगह आने वाला कच्चा तेल कितना महंगा पड़ सकता है। एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अगर रूस से मिलने वाले करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन तेल की जगह दूसरे स्रोतों से 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़े, तो भारत का सालाना तेल आयात बिल करीब 1.8 से 3.7 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
भारतीय मुद्रा में यह राशि करीब ₹15,000 करोड़ से ₹35,000 करोड़ से अधिक के अतिरिक्त खर्च के बराबर हो सकती है। हालांकि, यह एक संवेदनशीलता गणना है, निश्चित भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक नुकसान कच्चे तेल की कीमत, उपलब्धता, समुद्री भाड़े और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
Russian Oil India पर क्यों बढ़ा दबाव?
Russian Oil India की स्थिति को समझने के लिए भारत के मौजूदा आयात पैटर्न पर नजर डालना जरूरी है। रूस पिछले कुछ वर्षों में भारत के लिए कच्चे तेल का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में रूस से भारत को करीब 1.9 मिलियन बैरल प्रति दिन कच्चे तेल की आपूर्ति हुई, जो भारत के कुल क्रूड आयात का लगभग 42 फीसदी बताया गया है।
ऐसे में अगर रूस से आने वाली बड़ी मात्रा को अचानक किसी दूसरे स्रोत से बदलना पड़े, तो सिर्फ कीमत ही नहीं बल्कि सप्लाई की उपलब्धता भी चुनौती बन सकती है। कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में वैकल्पिक तेल जुटाने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे खरीदारों से भी प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
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हर दिन 10 लाख बैरल बदले तो कितना खर्च?
कमोडिटी एनालिस्ट नतालिया काटोना के मुताबिक, अगर भारत रूस से आने वाले करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन तेल को ऐसे क्रूड से बदलता है, जिसकी कीमत 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल अधिक है, तो अतिरिक्त सालाना खर्च करीब 1.8 से 3.7 अरब डॉलर हो सकता है।
अगर बदली जाने वाली मात्रा करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंचती है, तो यह प्रभाव लगभग दोगुना हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञ ने इसे मौजूदा कीमतों का पूर्वानुमान नहीं बल्कि एक sensitivity calculation बताया है।
इसका मतलब यह है कि वास्तविक अतिरिक्त खर्च परिस्थितियों के अनुसार कम या ज्यादा हो सकता है। इसलिए ₹35 हजार करोड़ का आंकड़ा संभावित लागत का अनुमान है, निश्चित नुकसान नहीं।
जुलाई में रूसी तेल की हिस्सेदारी 52% तक
रूस पर भारत की निर्भरता का अंदाजा जुलाई के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। ICRA के कॉरपोरेट सेक्टर रेटिंग्स से जुड़े अधिकारी प्रशांत वशिष्ठ के अनुसार, जुलाई में भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 52 फीसदी थी। इससे पहले के महीनों में यह हिस्सा लगभग 48-49 फीसदी के आसपास रहा था।
उनका कहना है कि इतनी बड़ी मात्रा में रूसी सप्लाई को बदलना आसान नहीं होगा। भारत के पास अमेरिका, ब्राजील, गुयाना और नाइजीरिया जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन जरूरत के मुताबिक पर्याप्त मात्रा में तेल उपलब्ध कराना चुनौती हो सकता है।
भारत में शुरू हो रहा है पीक फ्यूल डिमांड सीजन
Russian Oil India के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात भारत की घरेलू ईंधन मांग है। अक्टूबर से मार्च-अप्रैल के बीच भारत में ईंधन की मांग आमतौर पर मजबूत रहती है। इस अवधि में रिफाइनरियां भी ऊंची क्षमता पर काम करती हैं।
ऐसे समय में कच्चे तेल के आयात में बड़ी कटौती करना मुश्किल हो सकता है। अगर रूसी सप्लाई कम होती है, तो रिफाइनिंग कंपनियों को दूसरे देशों से कार्गो हासिल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है।
सिर्फ कच्चे तेल की कीमत नहीं, ढुलाई भी बड़ा खर्च
रूस की जगह दूर के बाजारों से तेल खरीदने पर केवल क्रूड की कीमत ही नहीं बढ़ती, बल्कि परिवहन खर्च भी महत्वपूर्ण हो जाता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि ब्राजील से भारत तक एक VLCC टैंकर की यात्रा का खर्च करीब 50-51 मिलियन डॉलर तक हो सकता है। इसमें कच्चे तेल की कीमत शामिल नहीं है।
ब्राजील और गुयाना जैसे देश भारत की सप्लाई में योगदान दे सकते हैं, लेकिन वहां से लंबी दूरी के कारण लॉजिस्टिक लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा भारत को जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अन्य एशियाई खरीदारों से भी उपलब्ध कार्गो के लिए प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है।
पश्चिम एशिया बन सकता है सबसे स्वाभाविक विकल्प
Kpler के रिफाइनिंग एनालिस्ट निखिल दुबे के मुताबिक, बाजार स्थिर होने पर पश्चिम एशिया भारत के लिए सबसे स्वाभाविक वैकल्पिक स्रोत हो सकता है। इसकी वजह भारत से भौगोलिक नजदीकी, अपेक्षाकृत कम परिवहन लागत और भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयुक्त क्रूड ग्रेड हैं।
हालांकि, पश्चिम एशिया से अतिरिक्त सप्लाई तुरंत हासिल करना आसान नहीं है। उपलब्ध कार्गो सीमित होने पर भारत को दूसरे खरीदारों से मुकाबला करना पड़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
रूस और ईरान की स्थिति में बड़ा अंतर
रूस की सप्लाई को ईरान के पुराने उदाहरण से जोड़कर देखना आसान लग सकता है, लेकिन दोनों मामलों का पैमाना अलग है। 2019 की शुरुआत में भारत ईरान से करीब 3.13 लाख बैरल प्रतिदिन तेल खरीदता था, जो कुल आयात का लगभग 6 फीसदी था। इसके मुकाबले अगस्त में रूस से करीब 19 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आने की बात कही गई है।
यानी Russian Oil India को बड़े पैमाने पर बदलना कहीं अधिक जटिल प्रक्रिया हो सकती है। चीन की बढ़ती कच्चे तेल की खरीद और वैश्विक रिफाइनरी गतिविधियों के कारण उपलब्ध कार्गो के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है।
भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
रूसी तेल पर अमेरिकी दबाव के बीच भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल ऊर्जा सुरक्षा और लागत के बीच संतुलन का है। उपलब्ध विशेषज्ञ आकलनों से संकेत मिलता है कि रूस से बड़ी मात्रा में तेल हटाने पर भारत को वैकल्पिक स्रोतों, परिवहन लागत और वैश्विक कीमतों—तीनों का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि, Russian Oil India को लेकर आगे की स्थिति अमेरिकी नीतियों, भारत की ऊर्जा रणनीति, रूस से व्यापार की शर्तों और वैश्विक कच्चे तेल बाजार पर निर्भर करेगी। इसलिए ₹35 हजार करोड़ तक के अतिरिक्त खर्च का अनुमान एक संभावित परिदृश्य है, अंतिम नुकसान का आंकड़ा नहीं।











