Pitru Paksha 2026: 5 Reasons Narayani Shila Is Special
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Pitru Paksha 2026: नारायणी शिला में श्राद्ध करने से पितरों को मिलता है मोक्ष, जानिए गयासुर से जुड़ी पौराणिक कथा

On: September 26, 2026 4:04 AM
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Pitru Paksha 2026 Shradh and Pind Daan at Narayani Shila Haridwar

हरिद्वार को देश के प्रमुख धार्मिक तीर्थों में गिना जाता है और यहां स्थित नारायणी शिला का पितृ कर्म की दृष्टि से विशेष महत्व बताया गया है। Pitru Paksha 2026 के दौरान हरिद्वार के मायापुर स्थित नारायणी शिला मंदिर में देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने की परंपरा है। यहां लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्मकांड कराते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नारायणी शिला भगवान विष्णु से जुड़ा पवित्र स्थल है। यही वजह है कि Pitru Paksha 2026 में पितरों के निमित्त यहां किए जाने वाले कर्मों को विशेष फलदायी माना जाता है। मंदिर में नारायण बलि समेत कई अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी कराए जाते हैं।

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पितृ पक्ष 2026 में क्यों खास है नारायणी शिला?

Pitru Paksha 2026 के दौरान पितरों को याद करने और उनके लिए श्राद्ध कर्म करने का विशेष महत्व माना जाता है। हिंदू धार्मिक परंपरा में पितृ पक्ष वह अवधि है, जब लोग अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। परिवार की परंपरा और पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।

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हरिद्वार की नारायणी शिला को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण स्थानों में माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां श्रद्धा से किए गए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण से पितरों की शांति की कामना की जाती है। Pitru Paksha 2026 में इस वजह से मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की उम्मीद रहती है।

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गया, नारायणी शिला और बदरीनाथ का क्या संबंध है?

नारायणी शिला से जुड़ी मान्यता भगवान विष्णु के तीन प्रमुख स्थलों से जुड़ी हुई बताई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिहार के गया में भगवान विष्णु के चरण माने जाते हैं, जबकि हरिद्वार की नारायणी शिला को उनका हृदय क्षेत्र माना जाता है। वहीं बदरीनाथ के बद्रिकाश्रम में भगवान विष्णु के मस्तक का संबंध बताया जाता है।

इसी धार्मिक मान्यता के कारण इन तीनों स्थानों पर पितरों के लिए किए जाने वाले कर्मकांड को विशेष महत्व दिया जाता है। Pitru Paksha 2026 में भी श्रद्धालु इन तीर्थ स्थलों पर पहुंचकर अपने पूर्वजों के लिए धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं।

गयासुर और भगवान विष्णु की कथा क्या है?

नारायणी शिला की पौराणिक कथा गयासुर और भगवान विष्णु से जुड़ी बताई जाती है। मंदिर से जुड़े धार्मिक विवरणों के अनुसार, गयासुर नामक राक्षस भगवान विष्णु से मिलने के लिए बद्रिकाश्रम पहुंचा था। कथा के अनुसार, बाद में भगवान विष्णु के श्रीविग्रह से जुड़े अलग-अलग हिस्सों का संबंध तीन प्रमुख तीर्थों से बताया गया।

मान्यता है कि भगवान विष्णु का मस्तक बदरीनाथ के ब्रह्मकपाल क्षेत्र में, हृदय और कंठ से नाभि तक का हिस्सा हरिद्वार की नारायणी शिला में और चरण गया में माने गए। इसी कथा के आधार पर नारायणी शिला को भगवान विष्णु के हृदय क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, गयासुर को भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष प्राप्त हुआ। इसके बाद इन तीन स्थानों पर भगवान विष्णु के निवास की मान्यता जुड़ी और पितरों के लिए यहां पूजा करने का महत्व बताया गया। यही वजह है कि Pitru Paksha 2026 के दौरान नारायणी शिला श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र बन जाती है।

एक लोटा जल चढ़ाने की भी है मान्यता

नारायणी शिला से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में जल अर्पित करने का भी विशेष उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से पितरों को याद करते हुए यहां जल अर्पित करने से पूर्वजों की आत्मा की शांति की कामना की जाती है।

हालांकि पितृ कर्म की विधि परिवार की परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। Pitru Paksha 2026 में मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालु अपनी मान्यता के अनुसार तर्पण, पिंडदान और अन्य कर्मकांड कराते हैं।

नारायण बलि समेत होते हैं कई धार्मिक अनुष्ठान

नारायणी शिला मंदिर में पितृ कर्म के तहत श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के अलावा नारायण बलि जैसे अनुष्ठान भी कराए जाते हैं। पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार कर्मकांड कराने के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं।

Pitru Paksha 2026 में भी देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों के नारायणी शिला पहुंचने की संभावना रहती है। कई परिवार पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहां अपने पूर्वजों के लिए धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं।

शिला में विराजमान हैं भगवान विष्णु के कंठ से नाभि तक का हिस्सा

नारायणी शिला मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, यहां भगवान विष्णु के कंठ से नाभि तक के हिस्से का प्रतीक शिला रूप में विराजमान है। इसी स्थान पर पितरों के लिए धार्मिक कर्मकांड किए जाते हैं।

मंदिर परिसर में पहले श्रद्धालुओं के पितरों के नाम से स्थान बनाए जाने की भी परंपरा बताई जाती है। समय के साथ ऐसे स्थानों की संख्या बढ़ने से मंदिर परिसर में जगह की कमी हुई और अब नए नामों के लिए स्थान उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं बताई जाती।

Pitru Paksha 2026 में उमड़ सकते हैं श्रद्धालु

पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार में धार्मिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं। नारायणी शिला भी इस दौरान श्रद्धालुओं के प्रमुख केंद्रों में शामिल रहती है। लोग अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने, तर्पण करने और पिंडदान के लिए यहां पहुंचते हैं।

Pitru Paksha 2026 में नारायणी शिला से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं एक बार फिर श्रद्धालुओं के बीच चर्चा में रहेंगी। हालांकि मोक्ष और धार्मिक फल से जुड़ी बातें आस्था और परंपरा पर आधारित हैं, लेकिन नारायणी शिला का पितृ कर्म से जुड़ा धार्मिक महत्व लंबे समय से श्रद्धालुओं के बीच माना जाता रहा है।

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