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1984 सिख विरोधी दंगों के दोषी पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का 80 वर्ष की उम्र में निधन

On: August 20, 2026 9:13 AM
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Sajjan Kumar, 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे कांग्रेस के पूर्व सांसद का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। तिहाड़ जेल में बंद पूर्व नेता की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

​तिहाड़ जेल से अस्पताल ले जाए गए Sajjan Kumar

​तिहाड़ जेल प्रशासन के अनुसार, गुरुवार को उनकी तबीयत गंभीर रूप से खराब हो गई थी। इसके तुरंत बाद जेल के मेडिकल स्टाफ ने प्राथमिक उपचार दिया और एम्बुलेंस के जरिए सफदरजंग अस्पताल रेफर किया। अस्पताल प्रशासन की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें मृत अवस्था में ही लाया गया था। अस्पताल में आवश्यक कानूनी व चिकित्सीय प्रक्रियाओं के तहत पोस्टमार्टम और अन्य औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं।

​Sajjan Kumar का राजनीतिक सफर और प्रभाव

​एक समय दिल्ली की राजनीति में Sajjan Kumar का बड़ा राजनीतिक प्रभाव माना जाता था। वे 1980 के दशक में उत्तर-पश्चिम दिल्ली और बाहरी दिल्ली क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते थे। उन्होंने तीन बार लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की:

  • 1980: पहली बार बाहरी दिल्ली सीट से सांसद बने।
  • 1991: दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे।
  • 2004: तीसरी बार चुनाव जीतकर अपने क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की।

​बाहरी दिल्ली के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में उनका मजबूत जनाधार माना जाता था। हालांकि, 1984 की घटनाओं में नाम सामने आने के बाद उनका पूरा राजनीतिक करियर विवादों के घेरे में आ गया।

​कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा

​दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2018 में दोषी ठहराए जाने के बाद, उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखकर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से औपचारिक इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद से वे पूरी तरह से सक्रिय राजनीति से अलग हो गए और न्यायिक हिरासत में रहे।

​1984 सिख विरोधी दंगे और कानूनी फैसले

​31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख विरोधी हिंसा भड़की थी। दिल्ली छावनी के राज नगर इलाके में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे में आगजनी के मामले में उन पर भीड़ को भड़काने और षड्यंत्र रचने के आरोप लगे थे।

​34 साल बाद आया था उम्रकैद का फैसला

​इस मामले में निचली अदालत ने 2013 में उन्हें बरी कर दिया था, लेकिन पीड़ितों और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने इस फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

  • दिसंबर 2018 का फैसला: दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए उन्हें आपराधिक षड्यंत्र और दंगा भड़काने का दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
  • 31 दिसंबर 2018: अदालती आदेश का पालन करते हुए उन्होंने कड़कड़डूमा अदालत में आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया था।

​पीड़ितों की लंबी कानूनी लड़ाई का अंत

​1984 के दंगों के पीड़ितों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए यह मामला दशकों तक चले कानूनी संघर्ष का प्रतीक बना रहा। कई प्रत्यक्षदर्शियों और गवाहों के बयानों के आधार पर विशेष जांच दल (SIT) और अदालतों ने इन मामलों की दोबारा सुनवाई की थी।

​विभिन्न कानूनी अपीलों और स्वास्थ्य आधार पर दायर याचिकाओं के बावजूद वे लगातार जेल में ही रहे। उनके निधन के साथ ही भारतीय राजनीति और न्यायिक इतिहास के एक लंबे तथा बहुचर्चित अध्याय का अंत हो गया है।

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