उत्तरकाशी के धराली में आई भीषण आपदा ने पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है। पहाड़ों की गोद में बसा यह शांत और खूबसूरत गांव अब मलबे और खंडहर में तब्दील हो गया है। सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, आपदा से 500 करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है। सैकड़ों घर, होटल और होमस्टे जमींदोज हो गए हैं, जबकि सेब के बागानों के उजड़ जाने से यहां के लोगों की आजीविका पर गहरा संकट मंडरा रहा है।
आज धराली के लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल है — “अब आगे क्या?” यह सवाल सिर्फ आपदा पीड़ितों के मन में ही नहीं, बल्कि राहत व पुनर्वास कार्य में जुटी सरकारी मशीनरी को भी बार-बार झकझोर रहा है। चारों तरफ फैला मलबा, ध्वस्त इमारतें और बर्बाद हो चुकी संरचनाएं मानो पुकार-पुकार कर पूछ रही हों कि क्या धराली फिर कभी अपनी पुरानी रौनक हासिल कर पाएगा?
सपनों से मलबे तक का सफर
आपदा से पहले धराली, उत्तराखंड के उभरते पर्यटन स्थलों में से एक था। यहां के लोग पर्यटन और बागवानी के सहारे सुखद भविष्य की कल्पना कर रहे थे।
भूपेंद्र ने सेब के बगीचों के बीच करीब 3 करोड़ रुपये की लागत से एक शानदार रिसॉर्ट बनाया था, जो आज मलबे में बदल चुका है।
रजनीश पंवार का होमस्टे, घर और बगीचा भी जलप्रलय की भेंट चढ़ गया — अब सिर छुपाने तक के लिए जगह नहीं बची।
जय भवान का 50 कमरों वाला आलीशान होटल कभी पर्यटकों और वीआईपी मेहमानों से गुलजार रहता था, लेकिन अब सिर्फ उसकी टूटी दीवारें और बिखरे पत्थर बचे हैं।
इनकी तरह सैकड़ों लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी की पूंजी धराली की मिट्टी में निवेश की थी। पर्यटन की असीम संभावनाओं और सेब के बागानों की खुशबू में लिपटे सपनों को उन्होंने खुद अपने हाथों से संजोया था। लेकिन आपदा की एक ही रात ने सब कुछ मिटा दिया।
क्या फिर उठ पाएगा धराली?
यहां के लोग जानते हैं कि जिंदगी रुकती नहीं — देर-सबेर घाव भर जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि कब और कैसे? क्या वे फिर उतनी ही ताकत से अपने टूटे घर, बिखरे व्यवसाय और बर्बाद बागानों को खड़ा कर पाएंगे?
अभी के हालात में न तो उनके पास आगे बढ़ने का साफ रास्ता है, न ही ठोस संसाधन। फिर भी, एक अटूट विश्वास है — अपनी मिट्टी से दोबारा जुड़ने का। यही चाह उन्हें संघर्ष की राह पर आगे बढ़ा रही है।
सेब उत्पादन और पर्यटन का खत्म होता अध्याय
आपदा से पहले धराली सिर्फ एक पर्यटन स्थल ही नहीं था, बल्कि सेब उत्पादन का बड़ा केंद्र भी था।
यहां के बागवान सालाना करीब 20 करोड़ रुपये का कारोबार करते थे।
अब हरे-भरे बगीचों की जगह पत्थर और मलबा है।
पर्यटन का ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, जिससे स्थानीय लोगों के आय के स्रोत लगभग समाप्त हो गए हैं।
तबाही का आकलन — भारी आर्थिक चोट
विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों के मुताबिक, धराली क्षेत्र में एक वर्ग किलोमीटर में पसरे मलबे ने लगभग 200 भवनों को पूरी तरह या आंशिक रूप से नष्ट कर दिया। इससे 210 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ है, जिसमें घर, दुकान, होटल, रिसॉर्ट और होमस्टे शामिल हैं।
इसके अलावा, धराली को निम्नलिखित चोटें भी झेलनी पड़ीं —
2 मोबाइल टावर ध्वस्त – नुकसान लगभग ₹95 लाख
800 मीटर सड़क बह गई – नुकसान लगभग ₹1 करोड़
एक छोटा पुल बह गया – नुकसान लगभग ₹1.5 करोड़
सिंचाई विभाग की सुरक्षा दीवार नष्ट – नुकसान लगभग ₹8.5 करोड़
बिजली व पानी की सुविधाएं तबाह – नुकसान लगभग ₹5 करोड़
सेब ग्रेडिंग मशीनें नष्ट – नुकसान लगभग ₹20 लाख
40–50 वाहन क्षतिग्रस्त – नुकसान लगभग ₹2.5 करोड़
धराली की मिट्टी से जुड़ने की हसरत
हालांकि, तमाम नुकसान और गहरे जख्मों के बावजूद यहां के लोग अपने गांव से मोह नहीं तोड़ पाए हैं। वे मानते हैं कि चाहे जितनी भी मुश्किलें आएं, वे दोबारा अपनी मिट्टी को चूमेंगे और उसे फिर से संवारेंगे। शायद यही जज़्बा धराली की नई शुरुआत की नींव रखेगा।





