भारत में “एक देश-एक चुनाव” की अवधारणा पर तेज़ी से चर्चा हो रही है। इस योजना का उद्देश्य सभी राज्यों और केंद्र सरकार के चुनाव एक साथ कराना है, जिससे समय, संसाधन और प्रशासनिक व्यवस्था पर बोझ कम हो सके। संयुक्त संसदीय समिति इस दिशा में कई महत्वपूर्ण सुझावों पर विचार कर रही है। विशेष रूप से, यदि किसी सरकार पर अविश्वास प्रस्ताव आता है या बहुमत नहीं रहता है, तो जर्मनी और जापान जैसे देशों के मॉडल अपनाने पर विचार किया जा रहा है।
समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने बताया कि यदि कोई सरकार कार्यकाल के बीच में गिर जाती है तो नई सरकार उसी अवधि के शेष कार्यकाल के लिए बनेगी। इससे चुनावों की नियमितता बनी रहेगी। इसके अलावा यह भी सुझाव आया है कि अगर अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है तो साथ ही यह भी बताया जाए कि अगला नेता कौन होगा — यानी ‘अविश्वास + विश्वास’ का मॉडल। इससे राजनीतिक अस्थिरता से बचा जा सकता है।
समिति ने यह भी पाया है कि बार-बार चुनावों से देश के कई क्षेत्रों में व्यवधान पैदा होता है। उत्तराखंड जैसे राज्यों में अप्रैल-मई पर्यटन का मुख्य सीज़न होता है, जिस दौरान चुनाव प्रक्रिया पर्यटन उद्योग को प्रभावित करती है। वहीं लाखों प्रवासी मजदूर बार-बार मतदान के लिए अपने राज्यों में लौटते हैं, जिससे उद्योगों पर असर पड़ता है। साथ ही, स्कूलों में पोलिंग स्टेशन बनने और शिक्षकों की ड्यूटी लगने से शिक्षा पर भी असर पड़ता है।
यह विधेयक पूरी तरह से जनता की सुविधा और लोकतंत्र की मजबूती के लिए लाया जा रहा है। समिति सभी वर्गों — नागरिक समाज, व्यापारी, अभिभावक और आम जनता — से बातचीत कर रही है ताकि एक व्यवहारिक और समावेशी समाधान निकाला जा सके। एक साथ चुनाव कराए जाने से मतदान प्रतिशत में वृद्धि होने की संभावना जताई गई है, जिससे लोकतंत्र को नई ताकत मिल सकती है।
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