अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली बड़ी विदेश यात्रा के लिए एक बार फिर सऊदी अरब को चुना है। 13 मई को उनकी इस यात्रा की शुरुआत सऊदी अरब से होगी, जिसके बाद वह कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का रुख करेंगे। यह फैसला पारंपरिक पश्चिमी सहयोगियों की बजाय खाड़ी देशों को प्राथमिकता देने का संकेत है, जो आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका की रणनीतिक दिशा को दर्शाता है। ट्रंप की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब मिडिल ईस्ट पहले से ही इजरायल-हमास संघर्ष और ईरान-अमेरिका तनाव जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है।
ट्रंप की इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य व्यापारिक समझौतों को अंतिम रूप देना है। व्हाइट हाउस और ट्रंप की प्रवक्ता कैरोलिन लेविट ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रपति इस क्षेत्र में “ऐतिहासिक वापसी” को लेकर उत्साहित हैं। उनका मकसद ऐसा माहौल बनाना है जहां वाणिज्यिक विकास, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग एक साथ आगे बढ़ सकें। ट्रंप के समर्थकों को उम्मीद है कि रियाद, दोहा और अबू धाबी में उनका शाही स्वागत किया जाएगा, जहां कई अहम डील्स पर मुहर लग सकती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब अमेरिका से अत्याधुनिक रक्षा उपकरण खरीदने की योजना बना रहा है, जिसमें एफ-35 लड़ाकू विमान और वायु रक्षा प्रणालियां शामिल हैं। वहीं, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी निवेश में 600 अरब डॉलर लगाने की बात कही है, जिसे ट्रंप ने एक ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाने की उम्मीद जताई है। यह केवल आर्थिक लेन-देन नहीं, बल्कि अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक रिश्तों की मजबूती का भी प्रतीक बन रहा है।
इस यात्रा के ठीक पहले ट्रंप ने कुछ प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर अपनी भूमिका को भी उजागर किया है, जैसे भारत-पाकिस्तान संघर्ष में युद्धविराम, गाज़ा में आखिरी अमेरिकी बंधक की रिहाई, और ईरान के साथ परमाणु वार्ता की बहाली। इन घटनाओं के मद्देनजर ट्रंप की यह खाड़ी यात्रा केवल कूटनीतिक या व्यापारिक नहीं, बल्कि एक व्यापक वैश्विक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
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