Ankita Bhandari Case: उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांडको लेकर कांग्रेस का कहना है कि मामले की जांच पूरी होने और सभी सवालों के जवाब सामने आने तक निष्पक्षता सुनिश्चित करना जरूरी है। हालांकि, कथित वीआईपी की भूमिका और नियुक्ति से जुड़े आरोपों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर सियासत एक बार फिर तेज हो गई है। अंकिता को न्याय दिलाने और मामले में कथित वीआईपी की भूमिका की जांच की मांग को लेकर उत्तराखंड कांग्रेस ने देहरादून में कैंडल मार्च निकाला। कांग्रेस नेताओं ने केंद्र सरकार से सवाल किया कि जब इस प्रकरण में कथित वीआईपी की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं और सीबीआई जांच की मांग की जा रही है, तो संबंधित व्यक्ति को राज्यपाल पद पर नियुक्त करने का फैसला कैसे लिया गया? पार्टी ने नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए इसे निरस्त करने की मांग भी उठाई।
Ankita Bhandari Case को लेकर कांग्रेस का कहना है कि मामले की जांच पूरी होने और सभी सवालों के जवाब सामने आने तक निष्पक्षता सुनिश्चित करना जरूरी है। हालांकि, कथित वीआईपी की भूमिका और नियुक्ति से जुड़े आरोपों को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
Ankita Bhandari Case कांग्रेस मुख्यालय से घंटाघर तक निकला कैंडल मार्च
उत्तराखंड कांग्रेस की ओर से आयोजित कैंडल मार्च प्रदेश मुख्यालय से शुरू हुआ। प्रदर्शनकारी घंटाघर की ओर गए और मार्च वापस कांग्रेस भवन पहुंचकर संपन्न हुआ। इस दौरान अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने, मामले में कथित वीआईपी की भूमिका की जांच कराने और राज्यपाल पद पर नियुक्ति निरस्त करने की मांग उठाई गई।
कैंडल मार्च का नेतृत्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने किया। इसमें उत्तराखंड की प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह और चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत समेत कई पार्टी नेता और कार्यकर्ता शामिल हुए।
प्रदर्शन के जरिए कांग्रेस ने यह संदेश देने की कोशिश की कि अंकिता भंडारी प्रकरण केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि उत्तराखंड में न्याय, महिलाओं की सुरक्षा और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ा सवाल भी है।
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Ankita Bhandari Case गणेश गोदियाल ने केंद्र सरकार से पूछे सवाल
कैंडल मार्च के दौरान गणेश गोदियाल ने कहा कि अंकिता भंडारी को न्याय दिलाना उत्तराखंड की अस्मिता और सम्मान से जुड़ा मुद्दा है। उनके मुताबिक, इस मामले में कथित वीआईपी का नाम सामने आने और उसकी भूमिका की जांच की मांग के बावजूद राज्यपाल पद पर नियुक्ति किए जाने से कई सवाल खड़े होते हैं।
गोदियाल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के फैसले से लोगों के मन में मौजूद संदेह और गहरा हुआ है। उन्होंने कहा कि जब अंकिता के माता-पिता और अन्य लोग कथित वीआईपी की भूमिका की जांच की मांग कर रहे थे, तब इस नियुक्ति को लेकर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए थी।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने यह भी दावा किया कि इस मुद्दे पर उत्तराखंड के साथ-साथ अन्य स्थानों पर भी विरोध हो रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार से सवाल किया कि अंकिता को न्याय दिलाने की मांग कर रहे लोगों की चिंताओं को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि कांग्रेस के बयान राजनीतिक आरोप हैं। किसी व्यक्ति की नियुक्ति अपने आप में अंकिता भंडारी मामले में उसकी संलिप्तता का प्रमाण नहीं है। ऐसे आरोपों पर निष्कर्ष जांच और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।
सीबीआई जांच पूरी होने से पहले नियुक्ति पर हरक सिंह रावत ने जताई आपत्ति
प्रदर्शन में शामिल कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत ने भी राज्यपाल पद पर नियुक्ति को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जन दबाव के बाद सरकार ने अंकिता भंडारी प्रकरण में सीबीआई जांच की संस्तुति की थी, लेकिन उनके अनुसार जांच पूरी होने से पहले ही संबंधित व्यक्ति को राज्यपाल बना दिया गया।
रावत ने सवाल किया कि जब मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई थी, तो केंद्र सरकार ने यह नियुक्ति किस आधार पर की। उन्होंने सिक्किम के राज्यपाल पद पर हुई नियुक्ति को तत्काल निरस्त करने की मांग भी उठाई।
कांग्रेस का तर्क है कि मामले में उठ रहे सवालों का जवाब सामने आना चाहिए और जांच को बिना किसी दबाव के आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए। पार्टी नेताओं ने यह भी कहा कि अंकिता के परिवार को न्याय दिलाने के लिए सरकार को पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
अंकिता भंडारी हत्याकांड क्यों बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा?
अंकिता भंडारी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में एक रिजॉर्ट में काम करती थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या का मामला सामने आया था। इस घटना ने पूरे प्रदेश में आक्रोश पैदा किया और महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ मामले की निष्पक्ष जांच को लेकर व्यापक चर्चा हुई।
मामले में आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई और अदालत में सुनवाई के बाद तीन आरोपियों को मई 2025 में आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने की खबरें सामने आईं। इसके बावजूद कथित वीआईपी की पहचान और उसकी संभावित भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस समय-समय पर तेज होती रही है।
इस मुद्दे पर अंकिता के परिवार की मांगों, विभिन्न राजनीतिक दलों के बयानों और जांच से संबंधित दावों को अलग-अलग समझना जरूरी है। किसी कथित भूमिका को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया से सामने आए निष्कर्षों को देखना आवश्यक है।
राज्यपाल नियुक्ति निरस्त करने की मांग, आगे क्या?
देहरादून में निकाले गए कैंडल मार्च के जरिए कांग्रेस ने अंकिता भंडारी प्रकरण को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। पार्टी ने कथित वीआईपी की भूमिका की जांच, नियुक्ति पर पुनर्विचार और अंकिता के परिवार को न्याय दिलाने की मांग दोहराई है।
अब इस विवाद में केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया, जांच की स्थिति और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयान महत्वपूर्ण होंगे। कांग्रेस का विरोध जारी रहने की स्थिति में यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति में और चर्चा का विषय बन सकता है।
फिलहाल, इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने से जुड़े सभी लंबित सवालों का जवाब पारदर्शी तरीके से कैसे सामने आएगा। राजनीतिक आरोपों से अलग, जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।