देहरादून, विशेष संवाददाता:
शिक्षा की नगरी देहरादून के एक प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते और मेडिकल शिक्षा की शुचिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। श्री गुरु राम राय (SGRR) इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेस की एमएस (नेत्र रोग) की छात्रा तन्वी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने कोहराम मचा दिया है। तन्वी का डॉक्टर बनने का सपना महज तीन महीने दूर था, लेकिन परिजनों का आरोप है कि विभागाध्यक्ष (HOD) के कथित मानसिक उत्पीड़न और ‘आर्थिक अपेक्षाओं’ ने एक होनहार जिंदगी का अंत कर दिया।
90 लाख की फीस और फिर रुपयों की डिमांड?
तन्वी के पिता डॉ. ललित मोहन ने संस्थान की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रियंका गुप्ता पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए हैं। पिता के अनुसार, तन्वी की पढ़ाई के लिए उन्होंने अब तक लगभग 90 लाख रुपये की भारी-भरकम फीस जमा की थी। पाठ्यक्रम पूरा होने में केवल तीन महीने शेष थे, लेकिन इसी अंतिम पड़ाव पर तन्वी को मानसिक रूप से इस कदर प्रताड़ित किया गया कि वह टूट गई।
आरोप है कि डॉ. प्रियंका गुप्ता अक्सर तन्वी से कहती थीं, “मैं एसोसिएट प्रोफेसर से एचओडी तो बन गई हूँ, लेकिन मेरा वेतन नहीं बढ़ा है।”
परिजनों का दावा है कि यह बार-बार कहना प्रत्यक्ष रूप से पैसों की मांग की ओर इशारा था। जब ये अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं, तो तन्वी के अकादमिक रिकॉर्ड को खराब करना शुरू कर दिया गया।
लॉगबुक में ‘शून्य’ और फेल करने की धमकी
परिजनों का आरोप है कि दबाव बनाने के लिए तन्वी की लॉगबुक में जानबूझकर शून्य अंक दर्ज किए गए, जबकि इससे पहले उसका प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा था। पिता डॉ. ललित मोहन ने बताया कि वह पिछले चार महीनों में तीन बार विभागाध्यक्ष से मिले और विनती की कि उनकी बेटी का भविष्य खराब न किया जाए, लेकिन उत्पीड़न कम नहीं हुआ। आरोप है कि तन्वी को लगातार यह धमकी दी जाती थी कि यदि ‘विभागीय अपेक्षाएं’ पूरी नहीं हुईं, तो उसे अंतिम परीक्षा में अनुत्तीर्ण (Fail) कर दिया जाएगा।
ईर्ष्या और गुटबाजी की भेंट चढ़ी तन्वी!
इस मामले में एक और पहलू सामने आया है—संस्थान के भीतर की गुटबाजी। तन्वी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. तरन्नुम शकील से काफी आत्मीय संबंध थे और वह उन्हें अपनी मां जैसा सम्मान देती थी। डॉ. तरन्नुम ने तन्वी की मेहनत के आधार पर उसे अच्छे अंक भी दिए थे। आरोप है कि वर्तमान विभागाध्यक्ष को यह निकटता पसंद नहीं थी और तन्वी पर डॉ. तरन्नुम से दूरी बनाने का दबाव डाला गया। इसी रंजिश के चलते तन्वी का मूल्यांकन जानबूझकर खराब किया गया।
पड़ोसियों की आँखों का तारा थी तन्वी
इंद्रेश अस्पताल के पास टीएचडीसी कॉलोनी में अपनी मां के साथ रहने वाली तन्वी केवल एक मेधावी छात्रा ही नहीं, बल्कि एक नेक दिल इंसान भी थी। मकान मालिक मेनका धीमान और पड़ोसी परमजीत कौर ने बताया कि तन्वी का स्वभाव अत्यंत सरल और सहयोगी था। वह अक्सर अपने अधीन काम करने वाले स्टाफ के लिए घर से अतिरिक्त खाना बनवाकर ले जाती थी और पड़ोसियों की आंखों की मुफ्त जांच भी कर दिया करती थी। उसकी मां की धार्मिक प्रवृत्ति और तन्वी की सादगी ने पूरे मोहल्ले में अपनी एक खास जगह बना ली थी।
न्याय की गुहार और जांच की मांग
इस घटना के बाद मेडिकल छात्रों और आम जनता में भारी रोष है। पिता ने न्याय की गुहार लगाते हुए एचओडी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और संस्थान के आंतरिक रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या लाखों की फीस देने के बाद भी मेडिकल छात्र सुरक्षित नहीं हैं? क्या ऊंचे पदों पर बैठे लोग छात्रों के भविष्य को अपनी निजी आय का जरिया बना रहे हैं?








